शल्य चिकित्सक एवं रुग्ण लेप्रोस्कोपिक सर्जरी को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसे ‘की-होल सर्जरी’ यानी सूक्ष्म-छिद्र के माध्यम से की जाने वाली शल्य चिकित्सा भी कहा जाता है। इसका कारण है लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में रोगियों को कम पीड़ा होती है और वे शीघ्र स्वस्थ होते हैं। जब सर्जन त्रि-आयामी (३डी) स्थान में शरीर के भीतर एक सूक्ष्म उपकरण को निर्देशित करने के लिए रोबोटिक भुजाओं का संचालन करते हैं, तो वे ऑपरेशन स्थल पर एक सूक्ष्म कैमरे द्वारा लिए गए द्वि-आयामी वीडियो से स्थान में गहराई का अनुमान लगाने के लिए अपने अनुभव और कौशल पर निर्भर होते हैं। भारत के बड़े शहरों में कुछ बड़े स्वास्थ्य केंद्रों में त्रि-आयामी दृश्यावलोकन वाली आधुनिक रोबोटिक सर्जरी प्रणालियां उपलब्ध हैं, परंतु ऐसी सुविधाएं सीमित और अत्यधिक महंगी हैं।

शल्यक्रिया स्थान की गहराई का बोध और त्रि-आयामी दृश्यावलोकन प्राप्त करने के लिए शल्य चिकित्सा के वर्तमान सेटअप में दो कैमरा वाली प्रणालियों अथवा उपकरणों पर महंगे संवेदक (सेंसर), चिन्ह (मार्कर) या लेबल का उपयोग किया जाता है। डीप लर्निंग तकनीक का उपयोग करने वाली एक अन्य पद्धति में जटिल गणनाओं की आवश्यकता होती है। ये विधियां महंगी हैं और इनमें अत्यंत उन्नत संसाधनों का उपयोग होता है जिसके कारण छोटे स्वास्थ्य केंद्रों के लिए ये पहुँच के बाहर हो जाती हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई की डॉ शुभांगी नेमा और प्राध्यापिका लीना वाच्छानी तथा आईआईटी गोवा के अभिषेक माथुर ने एक नई सॉफ्टवेयर तकनीक विकसित की है जो महंगे सेंसर या भारी संगणन (कंप्यूटिंग) शक्ति की आवश्यकता के बिना त्रि-आयामी स्थान में शल्य उपकरणों को ट्रैक करने के लिए मूलभूत ज्यामिति का उपयोग करती है। उनका सॉफ्टवेयर एक कैमरा से प्राप्त सामान्य वीडियो का उपयोग करके शल्य चिकित्सा उपकरणों का स्थान, स्थिति और दिशा का अनुमान लगा सकता है। त्रि-आयामी उपकरणों को ट्रैक करने की यह लागत प्रभावी पद्धति ‘वर्चुअल रियलिटी’ यानी आभासी वास्तविकता-आधारित प्रशिक्षण प्रणालियों को अधिक सक्षम बना सकती है और भविष्य में वास्तविक शल्य चिकित्सा में त्रि-आयामी दृश्यावलोकन प्रणालियों की लागत को बहुत कम कर सकती है।

डॉ नेमा कहती हैं, “हमने ज्यामितीय दृष्टिकोण को इसलिए चुना क्योंकि ज्यामिति मौलिक रूप से विश्वसनीय और समझने में सहज है। हमने इसमें पर्सपेक्टिव प्रोजेक्शन (३डी वस्तु २डी पटल पर कैसी प्रतीत होगी इसका चित्रण), उपकरणों की आकृति की सीमाओं और इंटरवल-बेस्ड अनिश्चितता मॉडलिंग (सटीक स्थिति के स्थान पर संभावित स्थिति की एक कक्षा का उपयोग) जैसे ज्यामितीय संकेतों का लाभ उठाया है।”

शोधकर्ताओं ने पाया कि शल्य चिकित्सा उपकरण को जुड़े हुए ज्यामितीय आकृतियों के एक समूह के रूप में मानकर वे सीधे द्वि-आयामी वीडियो फ्रेम में होने वाले परिवर्तनों से उपकरण कितने गहराई पर कार्य कर रहा है एवं उसके घूमने की दिशा की गणना कर सकते हैं। उन्होंने उपकरण के प्रत्येक भाग जैसे कि शाफ्ट और उससे जुड़े पकड़ (क्लैस्पर) के लिए ‘बाउंडिंग बॉक्स’ यानी सीमाकारी बक्सा बनाने हेतु एक एल्गोरिदम विकसित किया। प्रत्येक फ्रेम में इन बक्सों के आकार, विस्तार और उनके बीच के कोणों में होने वाले परिवर्तनों का अवलोकन करके वे उपकरण के अंगों की सापेक्ष और निरपेक्ष स्थिति तथा उनकी गति का अनुमान लगाते हैं।

यह एल्गोरिदम पर्स्पेक्टिव अर्थात परिप्रेक्ष्य के सिद्धांत का उपयोग करता है : जैसे-जैसे कोई वस्तु कैमरे से दूर जाती है, वह छोटी दिखाई देती है, और जैसे ही वह घूमती है, उसका प्रक्षेपित आकार पूर्वानुमेय रीति से विकृत हो जाता है। इन बाउंडिंग बॉक्स के क्षेत्रफल में होने वाले परिवर्तन को मापकर, एल्गोरिदम दृश्य में गहराई के परिवर्तन की गणना करता है। यदि बॉक्स सिकुड़ता है, तो उपकरण शरीर के भीतर गहराई में जा रहा है; यदि इसका विस्तार होता है, तो उपकरण बाहर की ओर आ रहा है। एल्गोरिदम स्क्रीन पर बॉक्स के केंद्र की गति को ट्रैक करता है और साथ ही प्रत्येक अक्ष के साथ घूर्णी गति निर्धारित करने के लिए आंतरिक कोणों में होने वाले परिवर्तनों का विश्लेषण करता है।

द्वि-आयामी छवियों से गहराई का सटीक अनुमान लगाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अपर्याप्त प्रकाश स्थिति, कैमरे में होनेवाले छोटे व्यत्यय या गति के कारण होने वाले धुंधलेपन से वस्तु की बाह्य रूपरेखा कभी कभी स्पष्ट नहीं हो पाती है।

डॉ नेमा स्पष्ट करती हैं, “कैमरा से प्राप्त दृश्य में, भिन्न-भिन्न त्रि-आयामी रचनाएँ एक ही समान द्वि-आयामी प्रक्षेपण या चित्र उत्पन्न कर सकती हैं। हमने संभावित समाधानों तक पहुँचने हेतु ज्यामितीय सीमाएं और इंटरवल-बेस्ड सीमाओं का उपयोग किया है।” उपकरण के सिरे का स्थान एक सटीक बिंदु पर बताने के स्थान पर यह एल्गोरिदम एक सीमा या अंतराल बताता है जिसमें वह सिरा उपस्थित हो सकता है। डॉ नेमा आगे बताती हैं, “उपकरण के ज्ञात आयामों और गति की निरंतरता को अपने एल्गोरिदम में सम्मिलित करके हमने समाधान की अनिश्चितता को कम किया है। यह दृष्टिकोण त्रि-आयामी अनुमान को अधिक स्थिर और सुदृढ़ बनाता है।”

शोधकर्ताओं के सिमुलेशन और प्रयोगों ने यह सिद्ध किया कि उनकी पद्धति उच्च सटीकता प्राप्त करती है, जिसमें उपकरण के विस्थापन के अनुमान में एक मिलीमीटर या उससे कम की त्रुटि और अभिविन्यास (ओरिएंटेशन) के अनुमान में नगण्य त्रुटि पाई गई। यह प्रणाली विशिष्ट ग्राफिक्स हार्डवेयर के बिना एक सामान्य कंप्यूटर प्रोसेसर पर चलने के लिए पर्याप्त कुशल है। इस पद्धति से लगभग 50 फ्रेम प्रति सेकंड की गति से वीडियो संसाधित हो सकता है, जो वास्तविक समय (रिअल-टाइम) के अनुप्रयोगों की आवश्यकताओं के पूर्णतः अनुरूप है।

अपनी पद्धति को सत्यापित करने के लिए शोधदल ने एक प्रायोगिक परीक्षण किया जिसमें गति का सटीक आकलन करने वाली एक ‘मोशन कैप्चर’ प्रणाली और एक स्थिर वेबकैम का उपयोग करके एक मापित (स्केल्ड) भौतिक मॉडल की ज्ञात गतियों को रिकॉर्ड किया गया। उन्होंने अपना ज्यामितीय एल्गोरिदम वेबकैम से प्राप्त विडिओ पर लागू किया एवं उससे प्राप्त आंकड़ों की तुलना प्रयोगात्मक सेटअप में मोशन कैप्चर संवेदक द्वारा प्रदान किए गए वास्तविक आंकड़ों से की। उन्होंने पाया कि इस पद्धति में त्रुटियां नगण्य थीं तथा भविष्य के अनुप्रयोगों के लिए उपकरणों की लेबलिंग और मोशन ट्रैकिंग हेतु इसका उपयोग किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने यह अवलोकन किया कि त्रि-आयामी ट्रैकिंग की सटीकता सीधे प्रारंभिक द्वि-आयामी दृश्य के ‘सेगमेन्टेशन’ (दृश्य का विभिन्न भागों में अर्थपूर्ण विभाजन) की परिशुद्धता पर निर्भर करती है; यदि संगणक शल्य उपकरण की कुछ त्रुटिपूर्ण बाह्य रूपरेखा प्रदान करता है, तो त्रि-आयामी अनुमान भी कम सटीक होगा। इसके अतिरिक्त, वर्तमान गणितीय मॉडल यह मानकर चलता है कि कैमरे का नाभ्यांतर अर्थात फोकस दूरी ज्ञात और स्थिर है। शोधकर्ता एल्गोरिदम में भविष्य में स्वचालित अंशांकन (ऑटोमेटेड कैलिबरेशन) को सम्मिलित करने की योजना बना रहे हैं।

शोधकर्ता सर्जनों को वास्तविक समय में प्रशिक्षण तथा सहायता प्रदान करने के लिए एक प्रयोगात्मक सेटअप में अपनी पद्धति का उपयोग करने की योजना बना रहे हैं।

प्रा. वाच्छानी निष्कर्ष निकालते हुए कहती हैं, “हमारा कार्य यह प्रदर्शित करता है कि वर्तमान में उपलब्ध मोनोकुलर (एकल लेंस आधारित द्वी-आयामी छवि लेने वाला) लेप्रोस्कोपिक कैमरे का उपयोग करके ही सर्जनों के लिए एक त्रि-आयामी दृश्य का अनुभव प्राप्त किया जा सकता है। की-होल जैसे सूक्ष्म-प्रवेशी शल्य चिकित्सा तंत्रों में गहराई का अधिक अच्छा बोध प्राप्त करने की दिशा में यह कार्य एक लागत प्रभावी और व्यावहारिक मार्ग प्रशस्त करता है।”