हमारे फेफड़ों के श्‍वसनमार्गों में एक प्राकृतिक रक्षा प्रणाली होती है जो किसी भी बाहरी पदार्थ, यहाँ तक कि सूक्ष्म कणों के प्रवेश करते ही सक्रिय हो जाती है।  श्‍वसनमार्ग में श्लेष्मा नामक एक तरल पदार्थ स्रावित होता है जिसमें सूक्ष्म कण फँस जाते हैं। किंतु हमारे शरीर के अंतर्निहित रक्षा तंत्र के उपरांत भी दिल्ली, मुंबई, और बेंगलुरु जैसे महानगरों में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए वायु प्रदूषण का बढ़ता स्तर एक निरंतर स्वास्थ्य संकट बन गया है। भारी धूम-कोहरे (स्मॉग) से भरी यह हवा बच्चों से लेकर वयस्कों तक सभी के लिए श्‍वसन संबंधी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न कर रही है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई के एक नवीनतम अध्ययन में यह पाया गया है कि श्‍वसनमार्ग में प्रदूषण या किसी बाहरी पदार्थ के प्रत्युत्तर में जब श्लेष्मा (म्यूकस) की मात्रा बढ़ती है, तो उससे सुरक्षा में सुधार नहीं होता है। इसके विपरीत श्लेष्मा की यह बढ़ी हुई मात्रा संकीर्ण उभारों (हम्प) का निर्माण कर देती है जिससे श्‍वसनमार्ग की भित्तियों के बड़े भाग अनावरित रह जाते हैं। श्‍वसनमार्ग पर श्लेष्मा की यह खंडमय रचनाएँ बता सकती है कि क्यों अत्यधिक श्लेष्मा हानिकारक होता है। इन रचनाओं के कारण संभवतः कालिख (सूट) के बारीक़ कण हमारे श्‍वसन प्रणाली में गहराई तक प्रवेश करते है जिससे दमे (अस्थमा) के दौरे उत्तेजित हो सकते हैं। 

स्वर्णादित्य हाजरा एवं प्राध्यापक जेसन आर. पिकार्डो द्वारा संचालित यह अध्ययन जर्नल ऑफ फ्लूइड मैकेनिक्स में प्रकाशित हुआ है और यह फेफड़ों के मध्य-श्‍वसनमार्गों पर केंद्रित है। मध्य-श्‍वसनमार्ग फेफड़ों की वे शाखाओं वाली नलिकाएं हैं जो श्वास नली और अंतिम वायुकोश (एअर सैक) के बीच स्थित होती हैं। वायु का प्रवाह, जो श्वास नली में विक्षुब्ध और अव्यवस्थित होता है, इन छोटे मध्य-श्‍वसनमार्गों में प्रवेश करने पर शांत और स्थिर होने लगता है।

श्‍वसनमार्गों के इस विशिष्ट क्षेत्र में श्लेष्मा के आवरण की भौतिकी ‘रैले-प्लेटो अस्थिरता’ नामक परिघटना द्वारा संचालित होती है। यह वही प्रक्रिया है जिसके कारण पानी की एक पतली धारा बूंदों में टूट जाती है। यह पृष्ठ तनाव (सर्फेस टेंशन) द्वारा निर्देशित होती है, जो नलिका के भीतर श्लेष्मा को वलयाकार आकृतियों या उभारों के रूप में खींच लेता है। 

इस शोध के सबसे चौंकाने वाले निष्कर्षों में से एक यह है कि श्‍वसन तंत्र में श्लेष्मा की मात्रा और अधिक बढ़ने से वास्तव में सुरक्षात्मक कवच क्षीण हो जाता है।

“कालिख के बहुतांश कण सूक्ष्म आकार के होते हैं (एक माइक्रोमीटर से भी छोटे); यदि श्‍वसनमार्ग की भित्तियां अनावृत हो तो ये नन्हे कण विसरण (डिफ्यूजन) के माध्यम से वहां निक्षेपित हो सकते हैं। हमारा शोध यह दर्शाता है कि श्‍वसनमार्गों पर श्लेष्मा के आवरण की मात्रा जैसे-जैसे बढ़ती है, वह उतनी ही अधिक विखंडित होती जाती है,” प्रा. पिकार्डो बताते हैं।

यद्यपि यह तर्कसंगत प्रतीत हो सकता है कि तरल की मात्रा अधिक होने से आवरण का विस्तार होगा, किंतु शोधकर्ताओं ने पाया कि ऐसा नहीं था।

“स्पष्ट रूप से कहें तो हमारा निष्कर्ष यह है कि श्लेष्मा की अधिक मात्रा वाले आवरण गहरे किंतु संकीर्ण उभारों में एकत्रित हो जाते हैं; इसके परिणामस्वरूप श्लेष्मा रहित क्षेत्र और विस्तृत हो जाते हैं। यह वास्तव में सहज बोध के विपरीत है,” प्रा. पिकार्डो आगे कहते हैं।

वे बताते हैं कि उनके शोधदल ने संगणकीय अनुरूपण (कंप्यूटर सिमुलेशन) चलाने से पहले ही सैद्धांतिक रूप से इस परिणाम का अनुमान लगा लिया था। स्थिरता एवं साम्यावस्था के सिद्धांतों के संयोजन का उपयोग करते हुए उन्होंने यह पूर्वानुमान लगाया कि पृष्ठ तनाव इस श्लेष्मा आवरण को इन सघन उभारों के रूप में खींच लेगा।

“अपनी अपेक्षाओं को सिद्ध होते देखना संतोषजनक था”, वे आगे व्यक्त करते हैं।

उच्च प्रदूषण वाले क्षेत्रों के निवासियों के लिए यह निष्कर्ष केवल एक गणितीय जिज्ञासा मात्र नहीं है—यह श्‍वसन स्वास्थ्य और जीवन रक्षा से जुड़ा विषय है। शहरी वातावरण में सामान्य रूप से पाए जाने वाले कालिख के कण प्रायः सूक्ष्म आकार के होते हैं, अर्थात मानव बाल की तुलना में हजारों गुना पतले होते हैं। ये नन्हे कण विसरण नामक प्रक्रिया के माध्यम से संचरण करते हैं। श्‍वसनमार्ग की भित्तियों के किसी भी अनावृत तथा असुरक्षित भाग पर उनके चिपकने की अत्यधिक संभावना होती है। जब मात्रा अधिक होने के कारण श्लेष्मा का आवरण विखंडित हो जाता है, तो फेफड़ों की भित्तियां असुरक्षित और संवेदनशील बन जाती देती है।

“आवरण की कमी होने के अतिरिक्त, श्लेष्मा की अत्यधिक मात्रा श्‍वसनमार्गों में भौतिक अवरोध भी उत्पन्न कर सकती है, जिससे हमारे जीवित रहने हेतु आवश्यक वायु का मार्ग ही अवरुद्ध हो जाता है,” स्वर्णादित्य अपने एक अन्य शोध कार्य का संदर्भ देते हुए बताते हैं। 

यह शोध तीव्र वेग से बढ़ने वाले (रैपिड-ऑनसेट) अस्थमा के ‘दुष्चक्र' पर भी प्रकाश डालता है। जब अस्थमा से पीड़ित कोई व्यक्ति किसी एलर्जन (एलर्जी उत्पन्न करने वाला पदार्थ) को सांस के माध्यम से भीतर लेता है, तो उसका शरीर अधिक श्लेष्मा स्रावित करके प्रतिक्रिया करता है। आईआईटी मुंबई के अध्ययन के अनुसार, अति-स्राव के कारण श्लेष्मा उन संकीर्ण उभारों में एकत्रित हो जाता है, जिससे श्‍वसनमार्ग की भित्ति का अधिक भाग उन्हीं एलर्जन कणों के संपर्क में आ जाता है जो मूलतः इस प्रतिक्रिया का कारण थे।

प्रा. पिकार्डो बताते हैं कि यह स्थिति एलर्जी की प्रतिक्रिया को और बढ़ा सकती है :

“एलर्जन का निक्षेपित होना श्लेष्मा के अति-स्राव और श्‍वसनमार्ग के संकुचन को प्रेरित करता है... इसके परिणामस्वरूप श्‍वसनमार्ग की भित्तियों का अधिक भाग एलर्जन के संपर्क में आ जाता है, एवं इसका अधिक निक्षेपण एलर्जी की प्रतिक्रिया को और अधिक तीव्र कर देता है।” 

यद्यपि तरल यांत्रिकी (फ्लूइड मैकेनिक्स) के नियमों को कोशिकीय प्रतिक्रियाओं से जोड़ने के लिए अभी अधिक शोध की आवश्यकता है, परंतु यह अध्ययन एक भौतिक आधार प्रदान करता है कि कुछ अस्थमा के दौरे इतनी शीघ्रता से गंभीर रूप क्यों ले लेते हैं।

अध्ययन में इस बात का भी पता लगाया गया है कि विभिन्न आकार के कण श्‍वसनमार्ग के इस ऊबड़-खाबड़ आंतरिक परिदृश्य में कैसे मार्गक्रमण करते हैं। बड़े कण, जिनमें जड़त्व अधिक होता है, श्लेष्मा के उभार के चारों ओर घूमती हुई हवा के साथ चलने में असमर्थ होते हैं। वे उभार के अग्रभाग से टकरा जाते हैं और वहीं फंस जाते हैं, जिसे ‘जड़त्वीय आघात’ कहा जाता है। छोटे कण हवा के अणुओं द्वारा इधर-उधर धकेले जाते हैं और श्लेष्मा रहित रिक्त स्थानों में गिर जाते हैं। परंतु कुछ कण ऐसे मध्यम आकार के होते है जो न तो इतने भारी होते हैं कि टकरा जाएं और न ही इतने हल्के कि हवा के साथ बह सकें। ये कण उभारों के अवरोधों को पार कर सकते हैं और फेफड़ों की रक्षा प्रणाली से पूरी तरह बच निकलने में सक्षम होते हैं।

इस खोज का औषधि उद्योग पर अत्यंत महत्वपूर्ण प्रभाव हो सकता है। वर्तमान मे श्वास के माध्यम से ली जाने वाली औषधियों पर अधिकांश शोध श्‍वसनमार्ग के प्रारंभी भाग (नाक) अथवा अंतिम भाग (वायुकोश) पर केंद्रित होता है। ये ‘मध्य-श्‍वसनमार्ग’ लंबे समय से एक रहस्य बने हुए हैं। श्लेष्मा के उभार कैसे बनते हैं और वे कणों को कहाँ पकड़ते हैं, इसे समझकर वैज्ञानिक अब ऐसे विशिष्ट ‘डिज़ाइनर औषधि कण’ विकसित कर सकते हैं जो ठीक उसी स्थान पर पहुँचें जहाँ उनकी आवश्यकता है। प्रा. पिकार्डो बताते हैं कि उनका व्यापक उद्देश्य संपूर्ण फेफड़े के प्रणाली का एक विस्तृत और परिपूर्ण मॉडल विकसित करना है।

“श्लेष्मा का आवरण होने वाले मध्य-श्‍वसनमार्गों में एरोसोल के निक्षेपण की अंतर्दृष्टि प्रदान करके हमारा कार्य  इस दिशा में योगदान देता है। इसका पहले कभी अध्ययन नहीं किया गया था,” प्रा. पिकार्डो कहते हैं। 

शोधकर्ताओं ने ‘सिलियरी एलीवेटर’ का भी विश्लेषण किया, जो सूक्ष्म बाल जैसी संरचनाएं होती हैं और फेफड़ों से श्लेष्मा को बाहर निकालने के लिए निरंतर स्पंदन करती हैं। उन्होंने पाया कि यद्यपि ये सूक्ष्म बाल कई मिनटों की अवधि में फेफड़ों की सफाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, किंतु वे धीमे कार्य करते हैं एवं एक सांस के समय के सूक्ष्म भाग में भीतर आया कण कहाँ गिरेगा इस बात को प्रभावित नहीं कर सकते। श्लेष्मा की गति की तुलना में हवा की गति सैकड़ों गुना अधिक होती है। अतः श्‍वसनमार्ग में श्लेष्मा की यह ऊबड़-खाबड़ ज्यामिति अनिवार्य रूप से हमारे द्वारा ली जाने वाली प्रत्येक सांस के लिए एक स्थिर बाधा बन जाती है।

यह शोध हमारे अपने शरीर के भीतर की भौतिकी की सुंदरता और जटिलता को रेखांकित करता है। जैसा कि प्रा. पिकार्डो कहते हैं, “कल्पना और तर्क” के साथ गणितीय मॉडलों का उपयोग करके,  इस शोधदल ने हम अपने पर्यावरण के साथ कैसे परस्परक्रिया करते हैं इस बात पर प्रकाश डाला है। स्पष्ट है कि ये प्रणालियाँ कैसे कार्य करती हैं, इस बारे में हमारी जानकारी की तुलना में अभी बहुत कुछ जानना शेष है। परंतु, जीवन रक्षक औषधि हो या कालिख का एक कण, सांस के माध्यम से भीतर जाने वाले प्रत्येक कण की यात्रा हमारे श्‍वसनमार्ग के भीतर के इन उतार-चढ़ाव द्वारा ही निर्धारित होती है, जो कि एक अत्यंत रोचक निष्कर्ष है।