विनाशकारी बाढ़ घटनाओं के कारण विश्वभर में हजारो लोगों की मृत्यु होने के साथ ही कई हजार लोग विस्थापित होते हैं। यह रूद्र प्रकोप हमें स्मरण कराते हैं कि जल कितना अप्रत्याशित एवं विनाशकारी हो सकता है। इस जलप्रकोप के प्रति मानव की संवेदनशील स्थिति ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई के शोधकर्ताओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस; एआई) पर आधारित एक परिष्कृत तथा दोहरे उद्दिष्ट वाली प्रणाली को विकसित करने के लिए प्रेरित किया, जिसे अगली बड़ी बाढ़ कहाँ आएगी तथा पानी वास्तव में कितनी गहराई तक बढ़ेगा यह अनुमान लगाने के लिए अभिकल्पित (डिज़ाइन) किया गया है।
उपग्रह से प्राप्त रडार डेटा को उन्नत मशीन लर्निंग तकनीकों के साथ जोड़कर इस शोधदल ने एक हाय-रिज़ॉल्यूशन (उच्च–विभेदन) वाली मानचित्रण यानी मैपिंग प्रणाली बनाई है जो 93% से अधिक सटीकता के साथ बाढ़-प्रवण क्षेत्रों की पहचान करती है। दक्षिण भारत में पश्चिमी घाट के तट पर कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के ताद्री से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तारित 55,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को सम्मिलित करने हेतु इस प्रणाली की रचना की गई है। यह नई प्रणाली भारत के सबसे संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों की सुरक्षा के लिए एक शक्तिशाली साधन प्रस्तुत करती है।
पारंपरिक रूप से, बाढ़ का पूर्वानुमान गत वर्षों के व्यापक वर्षा आंकड़ों एवं भौतिक संवेदकों (सेंसर) पर निर्भर करता है। आईआईटी मुंबई के शोधकर्ता डॉ. कशिश साधवानी एवं प्राध्यापक टी.आई. एल्दो ने इनके स्थान पर ‘पैटर्न रिकॉग्निशन’ (आकृति में विन्यास की खोज करना) का आधार लिया एवं बाढ़ स्थिति को प्रभावित करने वाले कई प्रमुख कारकों का विश्लेषण किया।
आईआईटी मुंबई के इस अध्ययन में पाया गया कि वर्षा की मात्रा की तुलना में सतही अपवाह यानी ‘सरफेस रनऑफ’ बाढ़ का अधिक महत्वपूर्ण संकेतक था।
डॉ. साधवानी स्पष्ट करते हैं, “यद्यपि बाढ़ की घटनाओं का प्राथमिक चालक वर्षा है, लेकिन यह किसी स्थान पर सीधे जलभराव में परिवर्तित नहीं होती है। सतही अपवाह उस स्थान की एकीकृत जलविज्ञान संबंधी प्रतिक्रिया दर्शाता है, जिसमे वर्षा की तीव्रता, मृदा की आर्द्रता, भूमि उपयोग, (भूमि की) पानी सोखने की क्षमता एवं जल निकासी विशेषताओं के संयुक्त प्रभाव सम्मिलित हैं। ”
इस डेटा को संसाधित करने हेतु शोधकर्ताओं ने दो चरणों वाली प्रक्रिया का उपयोग किया। सबसे पहले, एक वर्गीकरण (क्लासिफिकेशन) मॉडल यह पहचान करता है कि क्या किसी क्षेत्र में बाढ़ का संकट है। इसके पश्चात, एक ‘रिग्रेशन मॉडल’ संचयित होने वाले पानी की अनुमानित गहराई का आकलन करता है, जिससे संभावित जलभराव का एक अखंडित मानचित्र तैयार होता है। इस मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए, शोधकर्ताओं ने यूरोपीय स्पेस एजेंसी के सेंटिनेल-1 उपग्रह के सिंथेटिक अपर्चर रडार (एसएआर) चित्रों का उपयोग किया, जो मानसून के बादलों को प्रभावी ढंग से भेद सकते हैं एवं अवलोकन अंकित कर सकते हैं। पिछली बाढ़ के पूर्व एवं पिछली बाढ़ के समय के चित्रों की तुलना करके, मॉडल ने चित्रों में उन गहरे रंगों को पहचानना सीखा जो स्थिर पानी को दर्शाते हैं।
अंततः, यह मॉडल 30 मीटर के ग्रिड तक का उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाला मानचित्रण प्रदान करता है, लेकिन वर्तमान में यह लगभग 0.99 मीटर के त्रुटि अंतर यानी आरएमसई के साथ कार्य करता है। यद्यपि शहरी नियोजन में लगभग एक मीटर का यह विचलन महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है, डॉ. साधवानी का कहना है कि इस प्रणाली का वर्तमान महत्त्व इसके व्यापक विस्तार तथा शीघ्र गति में निहित है।
मॉडल की विशेषताएँ बताते हुए डॉ. साधवानी कहते हैं, “यह मॉडल क्षेत्रीय स्तर पर बाढ़ के शीघ्र मूल्यांकन के लिए अभिकल्पित किया गया है, जो उच्च संगणन दक्षता तथा विशाल क्षेत्रों में बाढ़ के विस्तार एवं गहराई की जानकारी शीघ्रता से उत्पन्न करने की क्षमता प्रदान करता है। यह विशेषता इसे आपदा के प्रारंभिक चरण में नियोजन हेतु, संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता देने तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया में सहायता के लिए विशेष रूप से मूल्यवान बनाती है।”
यह प्रणाली वर्तमान में 7% से कम ढलान वाले भूभागों पर ध्यान केंद्रित करती है। इस विचार को अध्ययन में उल्लिखित किया गया है एवं इसे विचारपूर्वक निश्चित किया गया है—“इमेज कैप्चर यानी छवि लेने के समय पानी की संभावित गति को ध्यान में रखते हुए, एसएआर चित्रों से सटीक बाढ़ जलभराव का मानचित्रण सुनिश्चित करने के लिए बाढ़ की गहराई की गणना को उन क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया था जहाँ ढलान 7% से कम था”।
इसके अतिरिक्त, तीव्र ढलान वाले भूभागों में, रडार के संकेत छाया (शैडो) एवं लम्बे वस्तुओं की दोषपूर्ण छवि (लेओवर) जैसी ज्यामितीय विकृतियों से प्रभावित होते हैं। चित्र प्राप्ति के समय पानी की गति भी बाढ़ के विस्तार एवं गहराई के निर्धारण में अशुद्धियों का कारण बन सकती है। इसलिए, ढलान की इस सीमा को लागू करने से यह सुनिश्चित करने में मदद मिलती है कि प्राप्त की गई बाढ़ की गहराई विश्वसनीय तथा भौतिक रूप से सुसंगत हो।
केरल तथा कर्नाटक के लिए यह प्रणाली संभवतः महत्वपूर्ण परिवर्तन लाने वाली सिद्ध हो सकती है। जिन क्षेत्रों में चिकनी मिट्टी यानी क्लेई सॉइल पानी को रोक लेती है एवं निचले तटीय मैदानों की अधिक उपस्थिति है, वहां 30 मीटर रिज़ॉल्यूशन वाला मानचित्र यानि मैप होने से स्थानीय अधिकारी सटीक रूप से यह देख सकते हैं कि कौन सा अस्पताल, विद्यालय या मार्ग जलमग्न होने की सबसे अधिक संभावना है।
डॉ. साधवानी इस बात पर बल देते हैं कि यह प्रणाली “बाढ़-प्रवण क्षेत्रों की पहचान कर सकती है, जिससे शहरी नियोजन एवं भूमि उपयोग प्रबंधन को दिशा मिल सकती है,” एवं यह “अधिकारियों को संसाधनों को प्रभावी ढंग से आवंटित करने तथा निकासी व राहत प्रयासों के लिए संवेदनशील क्षेत्रों को प्राथमिकता देने में सक्षम बनाकर आपदा प्रतिक्रिया में तथा बाढ़ का सामना करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका” निभा सकती है।
यद्यपि वर्तमान अध्ययन दक्षिण भारत के पश्चिमी तट के दक्षिणी भाग पर केंद्रित था, शोधकर्ताओं का मानना है कि यह ढांचा मुंबई जैसे जटिल शहरी केंद्रों या पूर्वी तट तक विस्तारित किया जा सकता है। यद्यपि, इन क्षेत्रों के लिए नए कारकों को ध्यान में रखना होगा एवं मॉडल को पुनः ‘कैलिब्रेट’ करने एवं पुनः प्रशिक्षित करने की आवश्यकता हो सकती है।
डॉ. साधवानी आगे बताते हैं, “तटीय वातावरण अतिरिक्त जटिलताओं को जन्म देता है, जैसे कि ज्वार-भाटे का उतार-चढ़ाव, चक्रवात की लहरें, समुद्र के स्तर में परिवर्तन एवं जल निकासी का उलटा बहाव यानी बैकफ्लो प्रभाव। वर्तमान प्रणाली में इन तटीय-विशिष्ट मापदंडों को सम्मिलित करके इस पद्धति को प्रभावी रूप से अनुकूलित किया जा सकता है।”
चूंकि जलवायु परिवर्तन के कारण अत्यधिक प्रतिकूल मौसम की घटनाओं में वृद्धि हो रही है, यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली केवल एक पूर्वानुमान से कहीं अधिक प्रदान करती है; यह आपदा प्रबंधन दलों को बाढ़ से होने वाली हानि को कम करने तथा क्षेत्रीय स्तर पर अनुकूलन क्षमता में सुधार करने हेतु योजनाएँ बनाने में सहायता करती है।
