करोड़ों की जनसंख्या वाले गंगा के मैदानी क्षेत्रों में बढ़ती तपिश अब मात्र असहनीय तापमान की समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर मानवीय संकट है। हीटवेव अर्थात तापीय लहरों की ये चरम घटनाएँ अब एक निरंतर आपदा बन चुकी हैं, जो प्रत्येक ग्रीष्म ऋतु में समय से पूर्व प्रारंभ होती हैं और दीर्घ अवधि तक बनी रहती हैं। प्रतिवर्ष इसके कारण उत्पन्न होने वाले स्वास्थ्य संकट और मृत्यु दर अत्यंत चिंताजनक विषय हैं।
जीवन और आजीविका को संकट में डालने वाली इस वार्षिक आपदा के क्या कारण हैं? यह धारणा लंबे समय तक बनी रही कि ऊष्म वायु कहीं और से यात्रा कर यहाँ आता है। अब भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के संसाधन अभियांत्रिकी अध्ययन केंद्र एवं जलवायु अध्ययन केंद्र के नए अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि भारत में गंगा के मैदानी क्षेत्रों में चलने वाली सभी तापीय लहरें (हीटवेव) एक जैसी नहीं होतीं, तथा उनके उद्भव के लिए उत्तरदायी कारक दूरस्थ होने से अधिक स्थानीय हैं।
“पारंपरिक रूप से पूर्वानुमान के प्रयासों में प्रायः इस बात पर बल दिया जाता है कि उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों से आने वाले ऊष्म वायु का संचार गंगा के मैदानी क्षेत्रों में हो रहा है या नहीं। हमारे परिणाम यह संकेत देते हैं कि इस क्षेत्र के भीतर तापीय लहरें कब और कहाँ विकसित होंगी, इसका पूर्वानुमान लगाने हेतु स्थानीय भूमि एवं वायुमंडलीय स्थितियों पर दृष्टि रखना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे पूर्वानुमानों को व्यापक क्षेत्रीय चेतावनियों के स्थान पर अधिक स्थान-विशिष्ट पूर्वसूचनाओंका रूप देने में सहायता मिल सकती है,” इस अध्ययन की मुख्य लेखिका एवं आईआईटी मुंबई की पीएचडी छात्रा मनाली साहा बताती हैं।
इन स्थानीय कारकों का गहन अध्ययन करने से पहले शोधकर्ता यह रेखांकित करते हैं कि तापीय लहर के विकसित होने के लिए प्रतिचक्रवात (एंटीसाइक्लोन) अर्थात बड़े स्तर पर उच्च वायुदाब प्रणाली का निर्माण एक आवश्यक स्थिति होती है।
तापीय लहर के लिए परिवेश बनाते प्रतिचक्रवात
प्रतिचक्रवात वायुमंडल में बड़े स्तर की उच्च वायुदाब की प्रणालियाँ होती हैं, जो प्रायः सैकड़ों किलोमीटर के क्षेत्र में विस्तृत रहती हैं। इनका उद्भव व्यापक परिसंचरण (सर्क्युलेशन) पद्धतियों के कारण होता है एवं ये समुद्री तापमान तथा भूमंडलीय स्तर के परिसंचरण जैसे दूरस्थ कारकों से प्रभावित होती हैं। शोधकर्ताओं का पूर्व में यह अनुमान था कि ये बड़ी प्रणालियाँ गंगा के मैदानी क्षेत्रों में उष्ण वायु का वहन करती हैं। किंतु यह नवीन शोध स्पष्ट करता है कि प्रतिचक्रवात की भूमिका तो रहती है, परंतु पूर्व की समझ से सर्वथा भिन्न रीति से।
उच्च वायुदाब वाली इन प्रतिचक्रवात प्रणालियों के कारण उष्ण वायु धरातल की ओर नीचे उतरती है एवं मेघों का बनना रुक जाता है। इसके फलस्वरूप उत्पन्न निरभ्र आकाश और तीव्र सौर विकिरण ताप लहरों के लिए अत्यंत अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित करते हैं। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में मानसून-पूर्व की ताप घटनाओं के समय ये प्रतिचक्रवात निरंतर उपस्थित रहते हैं, जो ऊष्मा के संचयन के लिए एक व्यापक परिवेश प्रस्तुत कर देते हैं। शोध के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि यद्यपि प्रतिचक्रवात तापीय लहरों के लिए आवश्यक तो हैं, किंतु वे अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं। उस उच्च वायुदाब प्रणाली के भीतर स्थानीय भूमि और वायुमंडलीय स्थितियाँ किस प्रकार की प्रतिक्रिया देती हैं, यही अंततः निर्धारित करता है कि वहाँ तापीय लहर अर्थात हीटवेव होगी अथवा नहीं।
आईआईटी मुंबई के अध्ययन में वर्ष 2010 के पश्चात की दस प्रमुख मानसून-पूर्व तापीय लहर की घटनाओं का ऊष्मा-बजट पद्धति और ईआरए-5 पुनरावलोकन आँकड़ों के माध्यम से विश्लेषण किया गया। ईआरए-5 वायुमंडलीय पुनरावलोकन आँकडे (ERA5 एनालिसिस डेटा) विगत मौसम का 1940 से वर्तमान समय तक का एक विस्तृत वैश्विक अभिलेख है। यह विधि तापमान परिवर्तन को विभिन्न भागों में विभाजित करती है जैसे अन्य स्थानों से आने वाली उष्ण वायु का योगदान, नीचे उतरते समय उष्ण होती वायु, एवं धरातल से उत्पन्न होने वाला ताप। समान व्यापक परिस्थितियों वाले निकटवर्ती तापीय लहर विरहित क्षेत्र एवं तापीय लहर प्रभावित क्षेत्रों की तुलना करके शोधकर्ताओं ने यह दर्शाया कि स्थानीय भूमि और वायुमंडल के मध्य का अंतर ही तापीय लहर उत्पन्न होने या ना होने का मुख्य कारण है। दो स्थानीय प्रक्रियाएँ, धरातलीय तापन और वायु का संपीड़न (कम्प्रेशन), मुख्य रूप से तापीय लहरों के निर्माण को प्रभावित करती हैं। आर्द्रता और मृदा की नमी जैसे अन्य स्थानीय कारक यह निर्धारित करते हैं कि तापीय लहर का स्वरूप कैसा होगा।
आर्द्र एवं शुष्क तापीय लहरें
यह अध्ययन प्रमाणित करता है कि समान व्यापक प्रतिचक्रवातीय स्थितियों के अंतर्गत भी दो अत्यंत भिन्न प्रकार की तापीय लहरें निर्मित हो सकती हैं। शोधकर्ताओं ने इन्हें आर्द्र और शुष्क तापीय लहरों के रूप में वर्गीकृत किया है। यह अध्ययन एक पग और आगे बढ़ते हुए यह दर्शाता है कि आर्द्र तापीय लहरें स्थानीय परिस्थितियों के एक विशिष्ट अनुक्रम से जुड़ी होती हैं जिसमें मानसून-पूर्व की वर्षा कुछ दिन पूर्व अतिरिक्त आर्द्रता प्रदान करती है, आर्द्र मृदा और बढ़ा हुआ वाष्पीकरण मेघों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं, रात्रि के समय निचले मेघ ऊष्मा को अवरुद्ध कर लेते हैं, एवं जैसे ही प्रतिचक्रवात निर्मित होता है, भूमि वायुमंडल में और अधिक ऊष्मा प्रवाहित करने लगती है। दूसरी ओर, शुष्क तापीय लहरें उन क्षेत्रों में बनती हैं जहाँ मृदा शुष्क होती है और आकाश पूर्णतः निरभ्र रहता है।
शुष्क तापीय लहरों के विपरीत जहाँ धरातलीय तापन प्रमुख होता है, आर्द्र तापीय लहरों में धरातलीय ऊष्मा, आर्द्रता एवं मेघों की प्रक्रियाओं के मध्य एक अधिक जटिल संतुलन निहित होता है। इसके परिणामस्वरूप केवल तापमान के आधार पर सदैव इन तापीय लहरों की विशिष्ट पहचान संभव नहीं हो पाती। इनके सटीक पूर्वानुमान के लिए विभिन्न ऊँचाइयों पर स्थानीय स्तर के आर्द्रता अवलोकनों की आवश्यकता हो सकती है।
इस विभेद के महत्व को स्पष्ट करते हुए मनाली साहा बताती हैं, “दोनों ही प्रकार की तापीय लहरें घातक सिद्ध हो सकती हैं। आर्द्र तापीय लहरें सामान्यतः मानव शरीर के लिए अधिक संकटपूर्ण होती हैं क्योंकि पसीने के माध्यम से शरीर को शीतल करने की प्रक्रिया इसमें निष्प्रभावी हो जाती है। किंतु शुष्क तापीय लहरें प्रायः अधिक मृत्युदर का कारण बनती हैं क्योंकि वे दीर्घ अवधि तक बनी रहती हैं तथा विशाल क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं। वर्तमान में, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग मुख्य रूप से तापमान के आधार पर ही तापीय लहरों की व्याख्या करता है एवं स्पष्ट रूप से आर्द्र तथा शुष्क तापीय लहरों के मध्य भेद नहीं करता है। तथापि, हमारा अध्ययन यह दर्शाता है कि आर्द्र एवं शुष्क तापीय लहरों के प्रेरक कारक पूर्णतः भिन्न हैं और इस अंतर को स्वीकार करने से प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को और अधिक सुदृढ़ बनाने में सहायता मिल सकती है।”
प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ बन सकती है अधिक सक्षम
यदि समस्या स्थानीय है, तो उसका अधिकांश समाधान भी वहीं निहित होगा। यह अध्ययन स्थानीय संकेतकों के एक ऐसे समूह की पहचान करता है जो तापीय लहर के आगमन एवं उसके प्रकार का पूर्वाभास दे सकते हैं, जैसे कि भूमि किस प्रकार तप्त हो रही है, मानसून-पूर्व वर्षा के विन्यास कैसे हैं, धरातल के निकट आर्द्रता का स्तर क्या है, वायु में शुष्कता कितनी है तथा क्या रात्रि के समय मेघों का निर्माण हो रहा है। विभिन्न स्थानों, ऊंचाइयों और समय के अंतराल पर इन संकेतों की अधिक विस्तृत निगरानी करने से पूर्वानुमानकर्ता पूर्वसूचना एवं स्थान-विशिष्ट सतर्कता संदेशों को और अधिक प्रभावी बना सकते हैं।
“एक बार जब किसी क्षेत्र के ऊपर बड़े स्तर की प्रतिचक्रवातीय प्रणाली स्थापित हो जाती है, तो पूर्वानुमानकर्ता इन स्थानीय पूर्व-संकेतकों पर सूक्ष्मता से ध्यान रख सकते हैं। जिन स्थानों पर ये संकेत सामान्य स्थिति से विचलित होने लगते हैं, वहाँ आगामी दिनों में तापीय लहर की स्थितियाँ बनने की संभावना अधिक हो सकती है,” आईआईटी मुंबई के प्राध्यापक कार्तिकेयन लंका बताते हैं।
तथापि, भारत में वर्तमान में अधिकांश सक्रीय प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ और ताप कार्य योजनाएँ केवल धरातलीय तापमान की सीमाओं पर आधारित हैं। शोधदल इस अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर तापीय लहर के लिए स्वयं की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और पूर्वानुमान हेतु निर्णय-सहायता उपकरण विकसित करने की योजना बना रहा है।
आईआईटी मुंबई के जलवायु वैज्ञानिक और इस शोधदल के सदस्य प्राध्यापक विशाल दीक्षित कहते हैं, “हमारा लक्ष्य इन पहचाने गए पूर्व-संकेतकों का उपयोग करके मशीन-लर्निंग आधारित एक निर्णय-सहायता प्रणाली विकसित करना है, जो पूरे भारत में तापीय लहर की पूर्वसूचना और स्थान-विशिष्ट पूर्वानुमानों को सुधारने में कार्यरत संस्थाओं की सहायता कर सके।”
शोधकर्ताओं के अनुसार, गंगा के मैदानी क्षेत्रों में तापीय लहरों की भौतिक कार्यप्रणाली का परीक्षण बहुत कम अध्ययनों में किया गया है, किंतु जलवायु परिवर्तन के कारण इन लहरों की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता को देखते हुए इन्हें समझना निरंतर महत्वपूर्ण होता जा रहा है। आईआईटी मुंबई का यह अध्ययन समयबद्ध और विश्वसनीय पूर्वानुमान तथा चेतावनी प्रणालियों के लिए आवश्यक अवलोकनीय घटक प्रदान करता है, यद्यपि इन अंतर्दृष्टियों को व्यावहारिक स्तर पर क्रियान्वित करने में कुछ समय लग सकता है।
