गुरुत्वाकर्षण क्वांटम यांत्रिकी के नियमों का पालन करता है यह सिद्ध करने के वैज्ञानिकों के प्रयास में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई के शोधकर्ताओं ने एक संभावित कमी का पता लगाया है। एक नए अध्ययन में शोधकर्ता पी. जॉर्ज क्रिस्टोफर एवं प्राध्यापक एस. शंकरनारायणन ने यह प्रदर्शित किया है कि गुरुत्वाकर्षण मौलिक रूप से क्वांटम प्रकृति का हो सकता है, भले ही लंबे समय से चला आ रहा ‘एनटैंगलमेंट टेस्ट’ यानी उलझाव परीक्षण गुरुत्वाकर्षण के लिए विफल हो जाए। इन शोधकर्ताओं ने ‘डायनेमिकल फिडेलिटी ससेप्टिबिलिटी’ (डीएफएस) नामक एक नए नैदानिक साधन का भी प्रस्ताव दिया है जो ब्रह्मांड के इस सबसे रहस्यमय बल की वास्तविक प्रकृति के परीक्षण के लिए एक अधिक संवेदनशील मीमांसा के रूप में कार्य करता है।

एक सदी से भी अधिक समय से सैद्धांतिक भौतिकी में दो विभाजित धारणाएं रहीं हैं। ब्रह्मांड कैसे कार्य करता है इसके लिए हमारे पास दो विलक्षण रूप से सफल सिद्धांत हैं। एक ओर शास्त्रीय भौतिकी, और अल्बर्ट आइंस्टीन का मौलिक कार्य सामान्य सापेक्षता (जनरल रिलेटिविटी) का सिद्धांत है जो ग्रहों, तारों और आकाशगंगाओं जैसी विशाल वस्तुओं की व्याख्या करता है। यह गुरुत्वाकर्षण को एक बल के रूप में नहीं बल्कि दिक्-काल या स्पेसटाइम नामक एक निरंतर और लचीले पट की वक्रता के रूप में वर्णित करता है।

दूसरी ओर क्वांटम भौतिकी परमाण्विक और उप-परमाण्विक स्तर के नियमों की व्याख्या करती है। इस क्वांटम भौतिकी के संसार में कण तरंगों की भांति व्यवहार कर सकते हैं और एक ही समय में कई स्थानों अथवा ‘क्वांटम अवस्थाओं’ में उपस्थित हो सकते हैं। अपने-अपने क्षेत्रों में अत्यधिक सफल होने के उपरांत ये दोनों सिद्धांत तब विफल हो जाते हैं जब इन दोनों क्षेत्रों का टकराव होता है—जैसा कि एक ब्लैक होल, अर्थात कृष्ण विवर के भीतर घटित होता है।

भौतिकविदों के अनुसार इन दोनों सिद्धांतों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का एक मार्ग है यह प्रदर्शित करना कि प्रकृति के अन्य मूलभूत बलों की भांति गुरुत्वाकर्षण भी अपनी प्रकृति में क्वांटम है। इसका अर्थ यह होगा कि गुरुत्वाकर्षण दिक्-काल की वक्रता नहीं बल्कि ‘ग्रेविटॉन’ नामक कणों द्वारा संचालित एक बल है। यह ठीक उसी तरह है जैसे प्रकाश के कण (फोटॉन) विद्युत चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं। यदि यह दिखाया जा सके कि गुरुत्वाकर्षण क्वांटम नियमों का पालन कर रहा है तो अंततः हमें ‘थ्योरी ऑफ एवरीथिंग’ अर्थात संपूर्ण जगत का सिद्धांत प्राप्त हो सकता है जो समीकरणों का एक ऐसा समूह होगा जो यह समझाएगा कि छोटे छोटे परमाणुओं तथा क्रिकेट की गेंदों से लेकर विशाल तारों और आकाशगंगाओं तक सब कुछ कैसे गति करता है।

गुरुत्वाकर्षण की क्वांटम प्रकृति का परीक्षण करने हेतु वर्ष 2017 में बोस-मार्लेटो-वेड्राल (बीएमवी) प्रयोग प्रस्तावित किया गया था। यह प्रयोग ‘एनटैंगलमेंट’ या उलझाव के रूप में ज्ञात एक क्वांटम गुण पर आधारित था। क्वांटम एनटैंगलमेंट एक ऐसी घटना है जिसमें कणों के जोड़े जैसे कि फोटॉन और इलेक्ट्रॉन इतनी गहराई से जुड़ जाते हैं कि उनके गुण एक-दूसरे पर निर्भर हो जाते हैं और उन्हें एक ही क्वांटम अवस्था साझा करने वाली एकल इकाई के रूप में वर्णित किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि एक कण के गुणों को मापने से उसके उलझे हुए साथी के गुण तुरंत निर्धारित हो जाते हैं, चाहे उनमें अंतर कितना भी क्यों न हो। बीएमवी प्रयोग ने एक सरल परीक्षण का सुझाव दिया कि यदि दो द्रव्यमान जो प्रारंभ में विभिन्न अवस्थाओं के स्थानिय (स्पेशियल) सुपरपोजिशन में हैं वे आपस में उलझ जाते हैं और वे केवल गुरुत्वाकर्षण के माध्यम से परस्पर क्रिया करते हैं तो गुरुत्वाकर्षण स्वयं निश्चित रूप से क्वांटम होना चाहिए।

जॉर्ज क्रिस्टोफर ने इसके बारे में टिप्पणी की,“बीएमवी प्रस्ताव अद्वितीय था क्योंकि फेनमैन और डीविट के पश्चात पहली बार इसने गुरुत्वाकर्षण के क्वांटम पहलुओं की जांच के लिए प्रयोगशाला में सुलभ एक मार्ग प्रस्तावित किया था। यह अधिकांश क्वांटम गुरुत्वाकर्षण परीक्षणों के विपरीत है जिनके लिए प्लैंकियन ऊर्जा स्तर (लगभग 1.96 *109 जूल) की आवश्यकता होती है जो हमारी वर्तमान प्रयोगात्मक पहुंच से बहुत दूर है।”

बीएमवी प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यदि हम द्रव्यमानों के मध्य एनटैंगलमेंट का निरीक्षण करने में असफल रहते हैं तो गुरुत्वाकर्षण क्वांटम प्रकृति का नहीं होगा। अपने नए अध्ययन में आईआईटी मुंबई के शोधदल का तर्क है कि ऐसा निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण हो सकता है और यह ग्रेविटॉन के गुणों की सूक्ष्मताओं की उपेक्षा करता है। उनका अध्ययन दर्शाता है कि गुरुत्वाकर्षण जैसा एक क्वांटम ‘मध्यस्थ’ (मीडिएटर) सुस्त और स्तब्ध बन सकता है जिससे वह अपने मूल में क्वांटम रहते हुए भी बाह्य लक्षण में शास्त्रीय या ‘क्लासिकल’ दिखाई दे सकता है।

शोधकर्ताओं ने तीन हार्मोनिक ऑसिलेटर, यानि लयबद्ध दोलकों से युक्त एक गणितीय मॉडल बनाकर इस निष्कर्ष को प्राप्त किया। हम इसकी कल्पना एक पंक्ति में स्प्रिंग्स द्वारा जुड़ी हुई तीन गेंदों ए, बी और सी के रूप में कर सकते हैं। सिरों पर स्थित दो गेंदें (ए और सी) वे द्रव्यमान हैं जो एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते हैं और केवल केंद्रीय गेंद (बी) के माध्यम से उनमें संवाद होता है। गेंद बी एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करती है। यह मध्यवर्ती गेंद गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है।

मध्यस्थ के गुणों में परिवर्तन करके शोधकर्ताओं ने दो भिन्न-भिन्न परिदृश्यों की पहचान की है। लाइट मीडिएटर रेजीम यानी हल्के मध्यस्थ शासन (एलएमआर) के अंतर्गत मध्यस्थ वस्तु स्वतंत्र रूप से गति करती है और दोनों सिरों की गेंदों के मध्य सहजता से एनटैंगलमेंट उत्पन्न कर देती है। इसके विपरीत हेवी मीडिएटर रेजीम यानी भारी मध्यस्थ शासन (एचएमआर) के अंतर्गत मध्यस्थ इतना सुस्त हो जाता है कि उसकी गति प्रभावी रूप से स्तब्ध हो जाती है और वह एक स्थिर पृष्ठभूमि की भांति व्यवहार करने लगता है।

“हमारे मॉडल में मध्यस्थ अभी भी मूलभूत रूप से एक क्वांटम-मैकेनिकल ऑसिलेटर ही है, अर्थात इसमें हिल्बर्ट स्पेस, ज़ीरो-पॉइंट फ्लक्चुएशन (शून्य-बिंदु अर्थात अत्यंत सूक्ष्म दोलन) एवं स्पष्ट क्वांटम अवस्थाओं जैसे क्वांटम गुण हैं। यद्यपि, हेवी मीडिएटर रेजीम में मध्यस्थ अत्यंत शक्तिशाली स्व-अंतःक्रिया और विशाल प्रभावी द्रव्यमान प्रदर्शित करता है, जिससे इसकी गतिक प्रतिक्रिया अत्यधिक कठोर हो जाती है,” प्रा. शंकरनारायणन ने समझाया।

इसका अर्थ यह है कि यदि ग्रेविटॉन एक भारी मध्यस्थ हैं, तो हम द्रव्यमानों के मध्य उलझाव या एनटैंगलमेंट का पता नहीं लगा पाएंगे, भले ही गुरुत्वाकर्षण मूलभूत रूप से क्वांटम ही क्यों न हो। इस स्थिति के कारण बीएमवी प्रयोग और उससे आगे क्वांटम एनटैंगलमेंट गुरुत्वाकर्षण की क्वांटम प्रकृति का परीक्षण करने के लिए एक कम प्रभावी उपकरण बन जाता है।

इस समस्या के समाधान के लिए शोधकर्ताओं ने ग्रेविटॉन के परीक्षण हेतु एक अधिक संवेदनशील अन्वेषण प्रस्तावित किया है जिसे ‘डायनेमिकल फिडेलिटी ससेप्टिबिलिटी’ कहा जाता है। यह घटना शास्त्रीय ऊष्मागतिकी की एक संकल्पना ‘थर्मोडायनामिक ससेप्टिबिलिटी’ के समान है जो यह मापती है कि कोई प्रणाली तापमान एवं दबाव जैसे बाहरी मापदंडों में होने वाले परिवर्तनों के प्रति कितनी संवेदनशील है। 

डायनेमिकल फिडेलिटी ससेप्टिबिलिटी पद्धति यहाँ द्रव्यमानों के केवल परस्पर जुड़ाव या उलझाव की जाँच करने के स्थान पर यह मापती है कि सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रतिक्रिया में प्रणाली की क्वांटम अवस्था समय के साथ कैसे परिवर्तित होती है। उनका शोध दर्शाता है कि जब गुरुत्वाकर्षण स्तब्ध होता है और एनटैंगलमेंट नगण्य होती है तब भी यह नवीन मापन विधि प्रणाली की क्वांटम प्रकृति के चिन्हों को पहचान सकती है। यह नई विधि गुरुत्वाकर्षण वास्तव में क्वांटम है अथवा नहीं यह परीक्षण करने का नया मार्ग भी प्रयोगकर्ताओं को प्रदान करती है।

“सैद्धांतिक रूप में द्रव्यमानों की एक प्रारंभिक क्वांटम अवस्था तैयार करके, उन्हें गुरुत्वाकर्षण अंतःक्रिया के अंतर्गत विकसित होने देकर और फिर विकसित अवस्था तथा मूल अवस्था के मध्य समानता (ओवरलैप) को मापकर फिडेलिटी का अनुमान लगाया जा सकता है,” प्रा. शंकरनारायणन ने बताया।

यह अध्ययन भविष्य के क्वांटम गुरुत्वाकर्षण प्रयोगों के लिए एक मार्गदर्शिका प्रदान करता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि भले ही हमें द्रव्यमानों के बीच उलझाव यानि एनटैंगलमेंट न मिले, हम गुरुत्वाकर्षण की क्वांटम प्रकृति के विचार को दुर्लक्षित न करें। इसके अतिरिक्त, डीएफएस विधि गुरुत्वाकर्षण संबंधित उस सटीक द्रव्यमान श्रेणी का पूर्वानुमान करने के लिए एक अधिक सटीक पद्धति प्रदान करती है।

“तत्वतः, लाइट और हेवी मीडिएटर रेजीम दोनों ही क्वांटम सह-संबंधों को संचालित कर सकते हैं। केवल एनटैंगलमेंट का अवलोकन करने से यह पता नहीं चलता है कि मध्यस्थ किस गतिक रेजीम में कार्य कर रहा है। दूसरी ओर डीएफएस विधि मध्यस्थ के गतिक गुणों के प्रति संवेदनशील है एवं लाइट और हेवी मीडिएटर रेजीम में गुणात्मक रूप से भिन्न व्यवहार प्रदर्शित करती है जिससे इन रेजीम में तब भी अंतर करना संभव हो जाता है जब एनटैंगलमेंट नगण्य हो,” जॉर्ज क्रिस्टोफर ने निष्कर्ष निकाला।