जलवायु परिवर्तन के संकट और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने राष्ट्रों को स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ने के लिए विवश कर दिया है। हमारे उपलब्ध प्राकृतिक गैस नेटवर्कों में हाइड्रोजन का मिश्रण करना एक महत्वपूर्ण रणनीति रही है। इससे प्राकृतिक गैस के उपयोग को नियंत्रित किया जा सकता है और तत्काल हजारों मील लंबी नयी आधारभूत संरचनाएं विकसित किए बिना ही कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लायी जा सकती है। भारत ने पहले ही इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, जहाँ एनटीपीसी लिमिटेड ने २०२३ में भारत की पहली हरित हाइड्रोजन सम्मिश्रण परियोजना (हाइड्रोजन ब्लेंडिंग प्रोजेक्ट) का शुभारंभ किया। सूरत के एनटीपीसी कवास टाउनशिप में पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) नेटवर्क के साथ शुरू हुई यह परियोजना तब से व्यापक स्तर पर विस्तारित हो चुकी है।
हाइड्रोजन को नियंत्रित करना और उसका परिवहन करना अत्यंत दुष्कर कार्य है। ब्रह्मांड का सबसे सूक्ष्म परमाणु होने के कारण यह अपने भंडारण के लिए उपयोग किये जाने वाले किसी भी ठोस पदार्थ, यहाँ तक कि पाइपलाइनों की स्टील अर्थात इस्पात की दीवारों में भी रिसने में सक्षम है। हाइड्रोजन सम्मिश्रण को सफलतापूर्वक बड़े स्तर पर उपयोग में लाने के लिए शोधकर्ताओं को विभिन्न इस्पात पाइप टूटने या रिसाव के जोखिम से पूर्व, वास्तव में कितनी हाइड्रोजन सहन कर सकते हैं इसके निर्धारण हेतु सटीक परीक्षण पद्धतियां विकसित करनी होंगी। वर्तमान में इसके परीक्षण के लिए हमारे पास उपलब्ध कई विधियां प्रायः त्रुटिपूर्ण परिणाम देती हैं और अब तक वैज्ञानिकों के पास इन विसंगतियों को समझने के लिए कोई उत्तर नहीं थे।
एक नए अध्ययन में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई और मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल मटेरियल्स, जर्मनी के शोधकर्ताओं ने धातुओं में हाइड्रोजन के विसरण (डिफ्यूजन) के परीक्षण की हमारी वर्तमान पद्धतियां प्रायः विफल होने के कारणों की पहचान की है। शोधकर्ता सुधा गौतम, माइकल रोवेर्डर एवं दंडपाणि विजयशंकर ने हाइड्रोजन-प्रेरित भंगुरता (हाइड्रोजन एंब्रिटलमेंट) के रूप में जानी जाने वाली एक घटना का परीक्षण किया जिसमें हाइड्रोजन परमाणु उच्च-शक्ति वाले इस्पात में रिस जाते हैं जिससे इस्पात भंगुर और क्षीण हो जाता है। उनका अध्ययन दर्शाता है कि भंगुरता उत्पन्न होने की प्रक्रियाओं को समझने के लिए उपयोग किए जाने वाले परीक्षण स्वयं ही कृत्रिम त्रुटियां और विसंगतियां उत्पन्न करते हैं जो दोषपूर्ण निष्कर्षों का कारण बनते हैं।
शोधकर्ताओं ने विद्युत-रासायनिक पारगमन (इलेक्ट्रोकेमिकल परमिएशन) तकनीक पर अपना ध्यान केंद्रित किया। इस व्यवस्था में परीक्षण के लिए रखे गए नमूने को दो विद्युत-रासायनिक सेल के बीच में दबाकर रखा जाता है। नमूने के एक ओर विद्युत-रासायनिक प्रक्रिया द्वारा हाइड्रोजन उत्पन्न की जाती है और उसे नमूने के भीतर प्रविष्ट कराया जाता है जिससे हाइड्रोजन के परमाणु दूसरी ओर विसरित (डिफ्यूज) हो सकें। दूसरी ओर एक संसूचक (डिटेक्टर) यह मापता है कि उस हाइड्रोजन का कितना अंश सफलतापूर्वक नमूने के पार निकल पाया है। यद्यपि यह एक स्थापित पद्धति है किंतु इस परीक्षण के परिणाम गणितीय पूर्वानुमानों से मेल नहीं खाते।
प्राध्यापक विजयशंकर ने विस्तार से बताया, “संसूचन की ओर हाइड्रोजन पारगमन प्रवाह (परमिएशन फ्लक्स)अर्थात धातु के माध्यम से विसरित (डिफ्यूज) होने वाली हाइड्रोजन की मात्रा को स्थिर स्थितियों में समय के साथ नहीं बदलना चाहिए। हमने जो अवलोकन किया वह इस प्रवाह में कमी को दर्शाता था और हम इसी के मूल की पहचान करना चाहते थे।”
जब शोधदल ने उच्च हाइड्रोजन चार्जिंग करंट यानी आवेशन धारा का उपयोग किया, तो उन्होंने स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी और रामन स्पेक्ट्रोस्कोपी के माध्यम से यह देखा कि इस्पात की सतह संक्षारित हो गई थी एवं उस पर जंग की एक पतली परत बन गई थी। इस जंग ने संसूचक द्वारा मापे गए हाइड्रोजन प्रवाह को प्रभावित किया। इलेक्ट्रॉन बैक-स्कैटर्ड डिफ्रेक्शन तकनीक का उपयोग करते हुए शोधकर्ताओं ने यह खोज की कि उच्च विद्युत प्रवाह ने ‘डिस्लोकेशन’ अर्थात विस्थापन नामक सूक्ष्म दोष उत्पन्न किए, जो इस्पात की क्रिस्टल संरचना में अनियमितताएं होती हैं और हाइड्रोजन को अपने भीतर फंसा लेती हैं।
सुधा गौतम कहती हैं, “हमने हाइड्रोजन चार्जिंग वाली सतह पर लोहे के संक्षारण के उत्पाद और नए उत्पन्न हुए विस्थापन पाए। ऐसा प्रतीत होता है कि अत्यधिक विद्युत-रासायनिक हाइड्रोजन चार्जिंग ज्यामितीय रूप से आवश्यक डिस्लोकेशन (ज्योमेट्रिकली नेसेसरी डिस्लोकेशन) के घनत्व को बढ़ा देती है। हमारी वर्तमान समझ इसे केवल छालों के निर्माण से जोड़ने तक सीमित है परंतु वास्तव में ये कैसे बनते हैं इसके लिए अभी और गहन अध्ययन की आवश्यकता है।”
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि उच्च विद्युत प्रवाह के कारण इस्पात की सतह पर हाइड्रोजन के बुलबुलों का निर्माण हुआ जिससे मापन के परिणामों में और अधिक विसंगति आई। प्रा. विजयशंकर के अनुसार,
“विद्युत-रासायनिक चार्जिंग के समय स्टील की सतह पर उत्पन्न परमाण्विक हाइड्रोजन के कुछ अंश के पुनर्संयोजन से हाइड्रोजन के बुलबुले बनते हैं। हाइड्रोजन बुलबुलों की अत्यधिक सक्रियता इलेक्ट्रोलाइट में ‘ओहमिक ड्रॉप’ का कारण बनती है जिससे सतह के विद्युत-रासायनिक नियंत्रण में त्रुटि उत्पन्न होती है। लोहे की सतह पर उच्च पीएच मान के साथ यह स्थिति लोहे के संक्षारण का कारण बन सकती है जो संसूचन की ओर हाइड्रोजन प्रवाह को प्रभावित करती है।”
रोचक बात यह है कि शोधदल ने पाया कि इन दोनों बाधाओं का समाधान, हाइड्रोजन उत्पन्न करने के लिए उपयोग किए जाने वाले विद्युत प्रवाह को कम करके चार्जिंग को “मृदु” करने में ही निहित था।
प्रा. विजयशंकर कहते हैं, “मिलीएम्पियर के स्थान पर हमने माइक्रोएम्पियर विद्युत धारा का उपयोग किया। इसका अर्थ है कि हाइड्रोजन परमाणुओं का निर्माण कम संख्या में हुआ। यद्यपि इसका तात्पर्य यह है कि नमूने के माध्यम से कम हाइड्रोजन परमाणु विसरित होते हैं, किंतु इससे कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि हमारी रुचि केवल यह मापने में है कि उत्पन्न परमाणुओं में से कितने परमाणु दूसरी ओर निकल पा रहे हैं।”
इसके अतिरिक्त शोधकर्ताओं ने पाया कि नमूने के संसूचन वाले पृष्ठ पर निकेल का लेप (कोटिंग) लगाने से इस्पात की सतह पर स्थित आयरन ऑक्साइड के साथ हाइड्रोजन परमाणुओं की अंतःक्रिया पूरी तरह समाप्त हो गई। ऑक्साइड हाइड्रोजन परमाणुओं को संसूचक तक पहुँचने से रोक सकते हैं जिससे मापे गए प्रवाह में कमी आ जाती है। इस अध्ययन से पता चलता है कि निकेल धातु का लेपन इस समस्या को कम कर सकता है। यद्यपि पैलेडियम धातु के लेप को इस कार्य के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है किंतु शोधदल ने पाया कि निकेल का लेप बहुत लागत प्रभावी है और इस उद्देश्य को पूरा करने में पर्याप्त है।
प्रा. विजयशंकर का कहना है, “ऑक्साइड के समान निकेल भी हाइड्रोजन को अपने भीतर फंसा लेता है, परंतु इस प्रभाव को हमारी गणन प्रक्रिया में ध्यान में रखा जा सकता है। पैलेडियम का उपयोग करना सर्वोत्तम होगा, किंतु इसकी अनुपलब्धता की स्थिति में कोटिंग विरहित होने की तुलना में निकेल की कोटिंग करना कहीं अधिक लाभदायक है।”
मृदु चार्जिंग की स्थितियों और निकेल लेपन द्वारा कहीं अधिक सटीक डेटा प्राप्त होने की पुष्टि करके यह अध्ययन हाइड्रोजन प्रवाह के प्रयोगशाला परीक्षण के लिए एक नया मानक प्रदान करता है। इससे अभियंताओं को हाइड्रोजन पाइपलाइनों के लिए सही सामग्री चुनने हेतु एक विश्वसनीय पद्धति भी उपलब्ध होती है। यह सुनिश्चित करता है कि यदि हम अंततः अपने घरों और कारों के लिए हाइड्रोजन ईंधन का उपयोग प्रारंभ करते हैं, तो उस ऊर्जा का वहन करने वाले पाइप एक ऐसे मानक पर निर्मित हों जो अप्रत्याशित रिसाव या टूट-फूट को रोक सके।
