आधुनिक युग में विनिर्माण के क्षेत्र में प्लास्टिक निर्विवाद रूप से अग्रणी रहा है। पैकेजिंग से लेकर मोटर वाहनों के पुर्जों तक, इसके टिकाऊपन एवं न्यून लागत के कारण प्लास्टिक अपरिहार्य बन चुका है। तथापि, प्लास्टिक के अपघटन में शतक लग जाते हैं, ये कचरा भराव क्षेत्रों अथवा महासागरों में संचित होता रहता है, एवं पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को नष्ट कर देता है। कृत्रिम तंतु-प्रबलित (फायबर-रिइंफोर्स्ड) प्लास्टिक, उदाहरणस्वरूप फाइबरग्लास या कार्बन फाइबर का पुनर्चक्रण अत्यंत कठिन होता है एवं ये भारी मात्रा में अनवीकरणीय जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर करते हैं। संधारणीय (सस्टेनेबल) विकल्पों की तात्कालिक आवश्यकता के कारण वैज्ञानिक एवं अभियंता जैव-अपघटनीय प्राकृतिक-तंतु सम्मिश्रों के विकास कार्य में अग्रणी हैं। कृषि अपशिष्ट, तीव्र गति से उगने वाली स्वदेशी घासों एवं पुनर्चक्रित बहुलकों (पॉलिमर) का सम्मिश्रण करके, शोधकर्ता ऐसे पदार्थों का निर्माण कर रहे हैं जो पारंपरिक प्लास्टिक के पर्यावरणीय प्रभाव को अत्यल्प रखते हुए उसकी यांत्रिक शक्ति को संवर्धित करते हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई की प्राध्यापिका अपर्णा सिंह इन प्राकृतिक-तंतु सम्मिश्रों (नैचुरल-फायबर कॉम्पोज़िट) की आवश्यकता रेखांकित करते हुए कहती हैं, “यह विधि पदार्थ में जैव-अपघटनीय घटक की मात्रा को बढ़ा देती है। ये तंतु थर्मोप्लास्टिक की तुलना में लागत प्रभावी भी होते हैं। इन प्राकृतिक तंतुओं को मिलाने से सम्मिश्रों के सामर्थ्य एवं दृढ़ता में उल्लेखनीय सुधार होता है।”
प्रा. सिंह एवं उनके छात्र नितिन कुमार आर्य ने आईआईटी मुंबई में अपने दल के साथ संधारणीय सम्मिश्र पदार्थों के विकास को एक नई दिशा दी है। उनके कुछ नवीनतम पेटेंट यह प्रदर्शित करते हैं कि यह तकनीक कितनी उन्नत हो चुकी है। उन्होंने सामान्य प्लास्टिक को मुंजा एवं दूर्वा घास जैसे जैव-अपघटनीय पदार्थों के साथ मिलाकर कई प्रकार के नवीन, पर्यावरण-अनुकूल पदार्थों का विकास किया है। ये हरित सम्मिश्र अधिक सुदृढ़, कठोर, हल्के, लागत प्रभावी एवं पुनर्चक्रण के लिए अत्यधिक योग्य हैं, जो चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देते हैं।
“कई अध्ययन भांग, पटसन या जूट जैसे व्यावसायिक प्राकृतिक तंतुओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं। किंतु हमारा कार्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध स्वदेशी घासों की अभियांत्रिक क्षमता को दर्शाता है। बहुलक के उन्नत सम्मिश्र अनुप्रयोगों के लिए यह क्षमता अनन्वेषित रही हैं,” प्रा. सिंह ने कहा।
पर्यावरणस्नेही-सम्मिश्रों के क्षेत्र में होने वाले नवाचार प्रायः जटिल तथा बहुव्ययी विधियों पर निर्भर रहे हैं। वे प्राकृतिक तंतुओं को प्लास्टिक के साथ चिपकाने मात्र के लिए रासायनिक कंपाटिबिलायजर (सुसंगतकारकों अर्थात मिश्रित न होने वाले बहुलकों को मिलाने के लिए प्रयुक्त रासायनिक योजक), परिक्षेपण अभिकारकों (डिस्पर्शन एजेंट) एवं कृत्रिम बंधकों (बाइंडर) पर भी अत्यधिक निर्भर थे। प्रा. सिंह का कार्य इस विषाक्त तथा जटिल आवश्यकताओं के एक बड़े भाग को हटा सकता है। उनका शोधदल प्लास्टिक को तंतु के साथ संयोजित करने की पर्यावरण-अनुकूल पद्धतियों का विकास कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप कई पेटेंट प्राप्त हुए हैं। उनका कार्य पॉलीलैक्टिक अम्ल (पीएलए) जैसे जैव-अपघटनीय बहुलक, इपॉक्सी राल (रेज़िन), पुनर्चक्रण योग्य हाय-डेंसिटी पॉलीएथिलीन (एचडीपीई), एवं पॉलीप्रोपिलीन (पीपी) को सुदृढ़ करने के लिए प्रचुर मात्रा में उपलब्ध स्वदेशी घासों, विशेष रूप से सैकरम मुंजा (मुंजा घास) एवं सायनोडोन डैक्टिलॉन (दूर्वा घास) का उपयोग करता है, जो पारंपरिक पदार्थों की तुलना में अत्यंत प्रभावी प्रदर्शन करते हैं।
प्रा. सिंह के शोधदल ने किसी भी रासायनिक सम्मिश्रण अभिकारकों का उपयोग न करते, बारीक कतरे हुए मुंजा घास के तंतुओं को सीधे एचडीपीई की गोलियों के साथ मिश्रित करने की एक पद्धति विकसित की है। इन सम्मिश्र के घटकों को इंजेक्शन मोल्डिंग मशीन के माध्यम से अत्यधिक टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल भागों में रूपान्तरित किया है। यह पदार्थ पारंपरिक ग्लास-फाइबर सम्मिश्रों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से लागत प्रभावी तथा हल्का भी होता है।
एक अन्य रोचक आविष्कार में दूर्वा घास या दूब का उपयोग किया गया है। यद्यपि इसे सामान्यतः एक तीव्र गति से उगने वाली वन्य घास माना जाता है, किंतु इसकी सघन एवं तंतुमय प्रकृति इसे एक उत्कृष्ट प्रबलन कारक अर्थात रिइंफोर्स्मेंट एजेंट बनाती है। दूर्वा घास में उपस्थित प्राकृतिक मोम एवं अशुद्धियों को हटाने के लिए इसे एक सरल क्षारीय (सोडियम हाइड्रोक्साइड) विलयन से उपचारित किया जाता है, जिससे इसके तंतु एचडीपीई के साथ दृढ़ता से बंध सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप निर्मित पदार्थ में एक ऐसा तन्य सामर्थ्य उत्पन्न होता है जो शुद्ध एचडीपीई की तुलना में कहीं अधिक होता है।
“प्राकृतिक तंतु स्वाभाविक रूप से जल-स्नेही सतहों से युक्त होते हैं, जबकि एचडीपीई जल-विरोधी होता है। इस अंतर के कारण तंतु-आधात्री आपस में ठीक से चिपक नहीं पाते, प्रतिबल का स्थानांतरण अकुशल होता है तथा यांत्रिक गुणों का ह्रास होता है। महंगे कंपाटिबिलायजर पर अत्यधिक निर्भर रहे बिना सुदृढ़ अंतरापृष्ठीय बंधन (इंटरफेस बॉन्डिंग) प्राप्त करना अत्यंत कठिन था,” प्रा. सिंह ने टिप्पणी की।
बड़े उद्योगों की भारी आवश्यकताओं के लिए शोधकर्ताओं ने एक उच्च-कार्यक्षमता वाले मुंजा तंतु-इपॉक्सी सम्मिश्र को भी पेटेंट कराया है। इस आविष्कार में मुंजा के तंतुओं को वस्त्रों के रूप में बुना गया है एवं निर्वात-सहायता प्राप्त ढालने की तकनीकों (वैक्यूम असिस्टेड मोल्डिंग) का उपयोग करके उनमे थर्मोसेटिंग इपॉक्सी राल भर दिया है। इस पद्धति से पदार्थ के तन्य सामर्थ्य में लगभग 40% का लक्षणीय सुधार हुआ है। अर्थात, जंगली घास एवं राल से निर्मित यह सम्मिश्र अब कृत्रिम ग्लास फाइबर की बराबरी कर सकता है।
अपने नवीनतम अध्ययन में इस शोधदल ने एक प्रचलित विनिर्माण प्रक्रिया, त्रि-आयामी मुद्रण (थ्री-डी प्रिंटिंग) को ध्यान में लिया है। शुद्ध एचडीपीई का थ्री-डी मुद्रण करना अत्यंत कठिन माना जाता है क्योंकि ठंडा होते समय यह प्लास्टिक सिकुड़ जाता है तथा विकृत हो जाता है।
“फ्यूज्ड डिपोजिशन मॉडलिंग (एफडीएम)-आधारित थ्री-डी मुद्रण प्रक्रिया में उपयोग के लिए एचडीपीई सबसे कठिन थर्मोप्लास्टिक पदार्थों में से एक माना जाता है, क्योंकि ठंडा होते समय इसमें उच्च तापीय संकुचन एवं विकृति उत्पन्न होती है। अत्यधिक विरूपण के कारण प्रायः इस पदार्थ के परतों का जुड़ाव दुर्बल हो जाता है तथा निर्मित भाग विफल हो जाता है। इस समस्या के समाधान की खोज करना इस अध्ययन की प्राथमिक प्रेरणाओं में से एक था,” नितिन कुमार आर्य ने बताया।
आईआईटी मुंबई के शोधकर्ताओं ने एक नवीन थ्री-डी प्रिंटिंग फिलामेंट यानी तंतु (वह पदार्थ या कच्ची सामग्री जिसका मुद्रण किया जाता है) विकसित किया है जिसमें 5 से 40 % तक मुंजा घास समाहित है। “एचडीपीई की तुलना में तंतुओं का तापीय प्रसार गुणांक कम होता है,” नितिन कुमार आर्य बताते हैं। अर्थात, प्लास्टिक के विपरीत, गर्म करने पर इनमें अत्यधिक विस्तार या संकुचन नहीं होता है। जब इन्हें एचडीपीई के साथ मिश्रित किया जाता है, तो ये तंतु प्लास्टिक के लिए एक आधार संरचना प्रदान करते हैं। इससे मुद्रण के समय उसे विकृत होने से रोका जा सकता है। थ्री-डी प्रिंटर में ‘एक्सट्रूज़न’ (मुद्रण करने हेतु सामग्री की सांचे से बाहर निकालने की क्रिया) एवं ‘बिल्ड-प्लेट’ (जिस सतह पर वस्तु को परत पर परत डालकर निर्मित किया जाता है) के तापमान का विशिष्ट समायोजन निर्धारित करके, यह सम्मिश्र बिना किसी त्रुटि के मुद्रित हो जाता है। इससे संधारणीय तथा उच्च सामर्थ्य वाले भागों के प्रोटोटाइप के शीघ्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त होता है।
वैश्विक स्तर पर इन नए पेटेंटेड पदार्थों के व्यावसायिक अनुप्रयोग अत्यंत व्यापक हैं। ये प्राकृतिक तंतु सम्मिश्र अत्यधिक हल्के एवं दृढ़ हैं, इसलिए वाहन उद्योग में इनका उपयोग ईंधन टंकी, वाहनों के आंतरिक पैनल, डैशबोर्ड तथा बंपर बनाने के लिए किया जा सकता है। भारत में वाहनों के जीवनकाल की समाप्ति एवं उनके पुनर्चक्रण से जुड़े निरंतर कड़े होते नियमों के कारण, प्लास्टिक का या तो कुशलतापूर्वक पुनर्चक्रण होना चाहिए अथवा उन्हें उच्च मात्रा में प्राकृतिक तंतुओं से युक्त संधारणीय पदार्थों का उपयोग करके निर्मित किया जाना चाहिए। घरेलू स्तर पर, ये पर्यावरण-अनुकूल भवन निर्माण पैनलों, संरचनात्मक आधारों, भवन निर्माण के समय अस्थायी सुरक्षा भित्तिओं एवं कुर्सियाँ-मेज जैसी उच्च गुणवत्ता वाले फर्नीचर के लिए आदर्श हैं। इन पदार्थों में दीमक के प्रकोप अथवा नमी से होने वाली क्षति का संकट भी नहीं होता। उपभोक्ता वस्तुओं एवं पैकेजिंग के लिए, इन पदार्थों का एकल-उपयोग वाले या पुनर्चक्रण में कठिन प्लास्टिक के स्थान पर उपयोग किया जा सकता है। इन सम्मिश्रों को टिकाऊ घरेलू वस्तुओं, पुनरुपयोगी बर्तनों एवं पैकेजिंग के पर्यावरण-स्नेही समाधानों में ढाला जा सकता है।
“यह शोध इंजेक्शन मोल्डिंग, फ्यूज्ड डिपोजिशन मॉडलिंग (थ्री-डी मुद्रण), एवं वैक्यूम-असिस्टेड रेजिन ट्रांसफर मोल्डिंग (वीएआरटीएम) प्रक्रियाओं में एक ही प्राकृतिक तंतु प्रणाली के सफल उपयोग को प्रदर्शित करता है। यह व्यापक अनुकूलता इन विकसित सम्मिश्रों के औद्योगिक विस्तार एवं उनके व्यावसायिकरण की संभावनाओं को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है,” नितिन बताते हैं।
संपूर्ण विश्व आज कार्बन उत्सर्जन को कम करने तथा कार्बन या ग्लास फाइबर जैसे पुनर्चक्रण के लिए अयोग्य कृत्रिम पदार्थों पर निर्भरता को घटाने हेतु तात्कालिक रूप से खोज कर रहा है। अतः हरित विनिर्माण अत्यंत आवश्यक होता जा रहा है। तीव्र गति से उगने वाली सामान्य जंगली घास को पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक के लिए एक प्रबलन कारक में बदलकर, वैज्ञानिक लागत प्रभावी एवं पर्यावरण के अनुकूल विनिर्माण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। हल्के ऑटोमोटिव भागों से लेकर संधारणीय उत्पाद पैकेजिंग तक, यह घास-प्रबलित प्लास्टिक हमें वास्तविक रूप से संधारणीय विनिर्माण के भविष्य के एक कदम और निकट ले आता है।
