निमोनिया तथा क्षय रोग से लेकर मूत्र मार्ग एवं रक्तप्रवाह के संक्रमणों के उपचार के साथ-साथ शल्य चिकित्सा, अंग प्रत्यारोपण एवं कीमोथेरेपी के समय संक्रमण को रोकने के लिए प्रतिजैविकों अर्थात एंटीबायोटिक्स का नियमित रूप से उपयोग किया जाता है। फिर भी उनके व्यापक तथा प्रायः अनियंत्रित उपयोग ने एक अन्य सुप्त संकट को जन्म दिया है जिसे सूक्ष्मजीवरोधी प्रतिरोध या एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के अनुसार केवल वर्ष 2023 में ही विश्व भर की हर छह नैदानिक लैबोरेटरीज़ में से एक ने इस बात की पुष्टि की है कि जीवाणु संक्रमण प्रतिजैविक उपचारों के प्रति प्रतिरोधी हो चुके थे ।
हमारे सबसे विश्वसनीय औषधियों को निष्प्रभावी करने के लिए जीवाणु अपने आप में विविध प्रकार के परिवर्तन ला रहे हैं। वर्ष 2017 से 2022 के मध्य, मात्र लगभग 10-12 नई प्रतिजैविक औषधियाँ (एंटीबायोटिक्स) बाजार में आई हैं, जिनमें से अधिकांश विद्यमान श्रेणियों के ही व्युत्पन्न हैं; इस कारण वे उन प्रतिरोध तंत्रों के प्रति संवेदनशील हैं जिन्हें जीवाणु पहले ही विकसित कर चुके हैं। नई औषधियों के आने के बाद भी सूक्ष्मजीव स्वयं को अनुकूलित करना जारी रखते हैं एवं शीघ्रता से प्रतिरोधी बन सकते हैं। इस वास्तविकता ने वैज्ञानिकों को न केवल इस पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है कि प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक्स) रोगाणुओं को कैसे नष्ट करते हैं, बल्कि इस पर भी कि जीवाणुओं को सर्वप्रथम उन्हें निष्प्रभावी करने से कैसे रोका जाए।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के रसायन विज्ञान विभाग के प्राध्यापिका रुचि आनंद एवं प्राध्यापक पी. आई. प्रदीपकुमार के नेतृत्व में किए गए दो नवीनतम अध्ययनों ने एक भिन्न योजना प्रस्तुत की है। नवीन प्रतिजैविक विकसित करने के स्थान पर इस शोधदल ने उन प्रतिजैविकों को जतन करने पर ध्यान केंद्रित किया जो पूर्व से ही विकसित हैं। दो पूरक शोधपत्रों में प्रकाशित उनका यह कार्य लघु डीएनए अनुक्रमों का उपयोग करता है जो उन प्रकिण्वों (एंजाइम्स) के साथ बंध कर या जुड़कर उन्हें अवरुद्ध कर सकते हैं जिनका उपयोग जीवाणु प्रतिजैविकों का प्रतिरोध करने हेतु करते हैं। इन एंजाइम्स की कार्यप्रणाली को बाधित करके शोधकर्ता प्रतिरोधी जीवाणुओं को सामान्य प्रतिजैविकों के प्रति पुनः संवेदनशील बनाने में सक्षम हुए।
“औषधि शोध से लेकर चिकित्सालय तक के लंबे तथा अत्यधिक लागत वाले मार्ग को देखते हुए विद्यमान औषधियों में ही सुधार करना एक अधिक व्यावहारिक मार्ग हो सकता है। हम कुछ गत वर्षों से विद्यमान औषधियों की सुरक्षा एवं प्रभावों से परिचित हैं तथा उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं,” प्रा. रुचि का कहना है।
एरिथ्रोमाइसिन एवं उससे संबंधित औषधियों सहित कई महत्वपूर्ण प्रतिजैविक जीवाणु के राइबोसोम से बंध कर कार्य करते हैं। राइबोसोम एक आणविक यंत्र होता है जो प्रोटीनों का निर्माण करता है। जब ये प्रतिजैविक जीवाणु के राइबोसोम के साथ बंध जाते हैं तब प्रोटीन उत्पादन अवरुद्ध हो जाता है एवं जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
यद्यपि ‘एरिथ्रोमाइसिन रेजिस्टेंस मिथाइलट्रांसफेरेज़’ (ईआरएम प्रोटीन) नामक अनेक जीवाणु एंजाइम राइबोसोम के आरएनए के एक विशिष्ट स्थल पर मिथाइल समूह नामक एक लघु रासायनिक समूह को जोड़ देते हैं। यह प्रक्रिया ‘मेथिलेशन’ के नाम से जानी जाती है। राइबोसोम के आरएनए के मेथिलेशन द्वारा ये एंजाइम प्रतिजैविक के जुड़ने के स्थल को सूक्ष्म रूप से परिवर्तित कर देते हैं। इसके परिणामस्वरूप औषधियां अब वहाँ उचित रूप से बंध नहीं पातीं, प्रोटीन का उत्पादन जारी रहता है एवं जीवाणु जीवित रहते हैं।
प्रथम अध्ययन में शोधकर्ता लीना बड़गुजर, दामिनी साहू, प्रा. रुचि एवं प्रा. प्रदीपकुमार ने विशेष रूप से पहचाने गए डीएनए के लघु खंडों पर ध्यान केंद्रित किया जिन्हें ‘एप्टामर्स’ कहा जाता है। पारंपरिक औषधियों के विपरीत, एप्टामर्स न्यूक्लिक अम्लों से निर्मित होते हैं। इनका प्रयोगशाला में संश्लेषण किया जाता है, ये अधिक स्थिर होते हैं और इनकी संरचना में सुगमता से परिवर्तन किया जा सकता है। अतः वे चिकित्सीय अनुप्रयोगों हेतु अत्यंत उपयुक्त विकल्प सिद्ध होते हैं।
ईआरएम42 नाम से जाने जाने वाले विशिष्ट ईआरएम एंजाइम से बंधने वाले डीएनए एप्टामर्स उत्पन्न करने हेतु शोधकर्ताओं ने सेलेक्स (SELEX) नामक प्रयोगशाला विधि का उपयोग किया। यह प्रक्रिया शोधकर्ताओं को लाखों विभिन्न डीएनए अनुक्रमों (सीक्वेंस) का परीक्षण करने तथा उन अनुक्रमों को पृथक करने की सुविधा देती है जो एक विशिष्ट लक्ष्य के साथ अत्यंत सुदृढ़ता से बंध सकते हैं। चयन के कई चरणों एवं ‘जेल-मॉनिटरिंग एसे’ तथा ‘सरफेस प्लास्मोन रेजोनेंस’ जैसी तकनीकों के साथ परीक्षण के पश्चात शोधदल ने दो ऐसे एप्टामर्स की पहचान की जो ईआरएम42 एंजाइम के साथ दृढ़तापूर्वक संलग्न थे।
केवल बंधना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु डीएनए को उस एंजाइम की कार्यप्रणाली को रोकना भी आवश्यक है।
इसके परीक्षण हेतु शोधकर्ताओं ने ‘इन विट्रो मेथिलेशन एसे’ जैसे जैव-रासायनिक विश्लेषणों का उपयोग किया जो कोशिका के बाहर नियंत्रित परिस्थितियों में यह मापते हैं कि एंजाइम अपना रासायनिक कार्य कितनी कुशलता से कर रहा है। परिणामों ने यह प्रदर्शित किया कि इन एप्टामर्स ने एंजाइम को राइबोसोम के आरएनए में मिथाइल समूहों को स्थानांतरित करने से रोक दिया, जिससे ईआरएम42 मिथाइलट्रांसफेरेज़ की सक्रियता बाधित हो गई।
प्रा. प्रदीपकुमार का कहना है, “इसके अतिरिक्त, हमने लक्ष्य प्रोटीन के प्रति उनकी विशिष्टता (स्पेसिफिसिटी) बढ़ाने के लिए अनावश्यक अनुक्रमों को हटाकर डीएनए एप्टामर्स को पुनर्गठित किया।”
यद्यपि प्रयोगशाला के विश्लेषणों में डीएनए एप्टामर्स ने उत्तम परिणाम प्रदर्शित किए तथापि एक अन्य चुनौती अभी भी विद्यमान थी। यह ज्ञात है कि जब केवल डीएनए अणुओं का स्वतंत्र उपयोग किया जाता है तब उनका न्यूक्लिएज एंजाइम के कारण क्षरण होने का भय होता है तथा उनके लिए जीवाणु-झिल्लियों को पार करना प्रायः कठिन होता है। यह स्थिति उनके लिए जीवाणुओं के भीतर प्रवेश करना कठिन बना देती है।
इस समस्या के समाधान हेतु द्वितीय अध्ययन में प्रथम लेखिका स्वागता पात्र ने प्रथम अध्ययन के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर एक लिपोसोम-आधारित वितरण प्रणाली का अन्वेषण किया।
लिपोसोम वसायुक्त अणुओं की दो-स्तरीय रचना से निर्मित सूक्ष्म बुलबुलों समान गोलाकार संरचनाएं हैं। लिपोसोम संरचनात्मक रूप से जैविक कोशिका झिल्लियों के सदृश होते हैं। इन संरचनाओं को प्रयोगशाला में कृत्रिम रूप से संयोजित किया जाता है। इस अध्ययन में प्रत्येक लिपोसोम में तीन प्रकार के लिपिड का मिश्रण समाहित था : एक लिपिड धनावेशित था ताकि वह ऋणावेशित डीएनए को आकर्षित कर सके, दूसरे लिपिड में झिल्ली में विलयन (फ्यूजन) को सुगम बनाने की क्षमता थी एवं तीसरे लिपिड में जैविक वातावरण में स्थिरता को बढ़ाने की क्षमता थी। इन लिपिड गोलों के भीतर डीएनए एप्टामर्स को बंद किया गया था।
परिणामस्वरूप जो कण प्राप्त हुए उनका व्यास लगभग 100 से 200 नैनोमीटर था। यह आकार इतना छोटा है कि शरीर की कोशिकाएं इन्हें सहजता से अपने अंदर शोष सकती हैं। ये प्रयोगशाला के बफर विलयन में भी स्थिर बने रहे जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि डीएनए एप्टामर लक्ष्य स्थल तक पहुँचने तक सुरक्षित रहें।
शोधकर्ताओं ने ऐसे अध्ययन किए जिनसे यह पुष्टि हुई कि एप्टामर युक्त लिपोसोम स्थिर थे तथा जैविक अनुप्रयोगों के लिए उपयुक्त आकार के थे। इसके पश्चात, कठिन संक्रमणों का कारण होने वाले प्रतिजैविक प्रतिरोधी स्टैफिलोकोकस ऑरिस बैक्टीरिया के भीतर एप्टामर पहुंचाने में लिपोसोम सफल हो सकते हैं या नहीं इसका शोधकर्ताओं ने परीक्षण किया। लिपोसोम में बंद होने के बाद बैक्टीरिया द्वारा डीएनए एप्टामर के ग्रहण किए जाने की दर में भारी वृद्धि हुई होकर यह 90% से अधिक हो गई, जबकि स्वतंत्र दिए जाने पर एप्टामर का अवशोषण लगभग शून्य था। जब प्रतिरोधी बैक्टीरिया संवर्धों (बैक्टेरियल कल्चर) के विरुद्ध इनका परीक्षण किया गया तो लिपोसोम के माध्यम से पहुंचाए गए एप्टामरों ने केवल प्रतिजैविक औषधियों की तुलना में बैक्टीरिया की कोशिकाओं की मृत्यु दर में अधिक वृद्धि की।
“यह महत्वपूर्ण है क्योंकि हम ईआरएम की गतिविधि को बाधित कर रहे हैं। राइबोसोम का मेथिलेशन नहीं हो रहा है और औषधि पुन: जुड़ने में सक्षम है। इस प्रकार प्रतिरोध को उलट दिया गया है,” प्रा. रुचि स्पष्ट करती हैं।
अब प्रश्न है कि क्या इस तरह का दृष्टिकोण नैदानिक उपयोग के स्तर तक बढ़ सकता है? प्रा. प्रदीपकुमार बताते हैं कि कई कारकों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना आवश्यक होगा, “उदाहरणस्वरुप, चयनित एप्टामर की शरीर में उपस्थित प्रोटीनों के साथ अनपेक्षित अंतःक्रियाएं नहीं होनी चाहिए तथा लिपोसोम को मानव कोशिकाओं के लिए सुरक्षित होना होगा।”
प्रा. रुचि का दृष्टिकोण सावधान परंतु आशावादी है। “डीएनए का संश्लेषण बहुत कठिन नहीं है और चिकित्सा क्षेत्र में लिपोसोम योगों (फॉर्म्युलेशन) का पहले से ही व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा है। डीएनए के सिरों पर रासायनिक संशोधनों द्वारा स्थिरता को और अधिक उन्नत किया जा सकता है—ये ऐसी रणनीतियाँ हैं जिनका न्यूक्लिक एसिड आधारित उपचारों में नियमित रूप से उपयोग किया जाता है,” वे बताती हैं।
भविष्य में यदि एप्टामर का चिकित्सीय उपयोग हेतु विकास किया जाता है तो एप्टामर को विद्यमान प्रतिजैविकों के साथ दिया जा सकता है। जीवाणुओं की प्रतिरोध प्रणाली को अवरुद्ध करके यह विशिष्ट निर्मित एप्टामर प्रतिजैविक की प्रभावकारिता को पुनः स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।
“पशुओं पर अध्ययन एवं फार्माकोकाइनेटिक विश्लेषण सहित अभी और अधिक कार्य की आवश्यकता है। किंतु इस दृष्टिकोण की विशेषता इस तथ्य में निहित है कि हम पुरानी प्रतिजैविक औषधियों को पुनः कार्यक्षम बना सकते हैं,” प्रा. रुचि निष्कर्ष निकालती हैं।
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