मानव यकृत शरीर में फैट्स यानी वसा के यातायात नियंत्रक की भाँति कार्य करता है, जो शरीर की आवश्यकताओं के अनुसार यह निर्धारित करता है कि कितनी वसा का संचय करना है एवं कितनी वसा को रक्तप्रवाह में छोड़ना है। यकृत की कोशिकाओं के भीतर सूक्ष्म खंड होते हैं जिन्हें लिपिड बूँदें कहा जाता है। ये बूँदें ट्राइग्लिसराइड एवं कोलेस्ट्रॉल जैसी वसा के लिए अस्थायी संचय का काम करती हैं। यकृत इनमें से कुछ वसा को ‘वेरी लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन’ (वीएलडीएल) नामक सूक्ष्म कणों में संपुटित करके रक्तप्रवाह में छोड़ देता है। परंतु निरंतर अत्यधिक वसायुक्त आहार के कारण यह प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हो जाती है एवं लिपिड का हानिकारक स्तर पर संचय होने लगता है, जो मोटापा, मधुमेह एवं हृदय रोग को आमंत्रण देता है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई के शोधकर्ताओं ने भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) पुणे एवं आईआईएसईआर कोलकाता के सहयोगियों के साथ मिलकर, एक ऐसे प्रमुख कोशिकीय तंत्र की खोज की है जो यकृत से वीएलडीएल के इस स्राव को बाधित कर सकता है। इसके लिए रक्तप्रवाह में लिपिड यानी वसा को कम करने के लिए पारंपरिक रूप से उपयोग किए जाने वाले एंजाइमों, रिसेप्टर्स या जीनों के स्थान पर लिपिड बूँदों की भौतिक गति को लक्षित किया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कोशिकीय तंत्र को बाधित करने से यकृत में लिपिड का संचय नहीं होता है, जो भविष्य में औषधि विकास के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक लाभ है। ये निष्कर्ष उच्च कोलेस्ट्रॉल एवं उच्च ट्राइग्लिसराइड जैसे विकारों के साथ-साथ फैटी लिवर यानी वसायुक्त यकृत रोग जैसी स्थितियों के उपचार के लिए एक संभावित नया मार्ग प्रशस्त करते हैं।
यकृत कोशिका के भीतर गति करने हेतु लिपिड बूँदें ‘काइनेसिन’ नामक प्रोटीन पर निर्भर करती हैं जो उन्हें कोशिका के भीतर विभिन्न स्थानों तक ले जाने का कार्य करता हैं। आईआईटी मुंबई के जैव विज्ञान एवं जैव अभियांत्रिकी विभाग में प्राध्यापक रूप मल्लिक की प्रयोगशाला एक दशक से अधिक समय से इस लिपिड-परिवहन प्रक्रिया पर शोध कर रही है। इस अनुसंधान का नेतृत्व करने वाले प्रा. मल्लिक स्पष्ट करते हैं,
“हमारे शोधदल के पिछले शोध ने यह दर्शाया था कि ‘मोटर प्रोटीन काइनेसिन-1’ विशेष रूप से लिपिड बूँदों के वाहक के रूप में उनको कोशिका के छोर की ओर ले जाता है, जहाँ वीएलडीएल को संयोजित करके रक्तप्रवाह में छोड़ा जाता है।”
इस शोध ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथा विचारोत्तेजक प्रश्न खड़ा किया कि क्या इस परिवहन प्रक्रिया को बाधित करने से यकृत से बाहर भेजी जाने वाली वसा की मात्रा को कम किया जा सकता है?
काइनेसिन-1 को पूर्णतः अवरुद्ध करने से काइनेसिन पर निर्भर अन्य आवश्यक कोशिकीय प्रक्रियाएँ बाधित हो जाती हैं एवं कोशिका अस्थिर हो जाती है। सह-प्रथम लेखक डॉ. शुभम कुमार त्रिपाठी कहते हैं, “अतः हमारा उद्देश्य काइनेसिन की केवल लिपिड बूँद के साथ होने वाली अंतःक्रिया को ही चयनात्मक रूप से रोकना था, ताकि अतिरिक्त लिपिड का परिवहन एवं उनकी रक्तप्रवाह में मुक्त होने की क्रिया को नियंत्रित किया जा सके।”
एक महत्वपूर्ण सफलता तब प्राप्त हुई थी जब प्रा. मल्लिक के शोधदल ने पूर्व में यह खोज की थी कि काइनेसिन-1 प्रोटीन का पुच्छ क्षेत्र (प्रोटीन की श्रृंखला में अंत में स्थित एमिनो एसिड) यकृत की कोशिकाओं में, अन्य कोशिकीय अंगकों को प्रभावित किए बिना लिपिड बूँदों के स्थिती को बाधित कर देता है। यह अंतर इन कोशिकीय अंगकों की संरचनात्मक विशेषताओं में निहित है। इस अध्ययन के सह-प्रथम लेखक डॉ. अर्चिस्मान महापात्रा स्पष्ट करते हैं,
“कोशिकाओं के भीतर अधिकांश झिल्लियाँ दोहरी परत वाली संरचना से निर्मित होती हैं जिसे बायलेयर कहा जाता है। परंतु लिपिड बूँदें भिन्न हैं क्योंकि वे एकल परत वाली झिल्ली से घिरी होती हैं, जिसे मोनोलेयर कहा जाता है।”
इसी दृष्टिकोण की आधारशिला पर आगे बढ़ते हुए, वर्तमान अध्ययन में प्रा. मल्लिक के शोधदल ने काइनेसिन-1 के पुच्छ क्षेत्र से व्युत्पन्न ‘केटीडीपी’ नामक एक लघु पेप्टाइड (अमीनो अम्लों की एक लघु श्रृंखला) की पहचान की है, जो इस प्रोटीन को चयनात्मक रूप से लिपिड बूँदों से जुड़ने से अवरुद्ध कर सके।
आईआईएसईआर कोलकाता में प्राध्यापिका नीलांजना सेनगुप्ता की प्रयोगशाला के साथ सहयोग करते हुए, शोधकर्ताओं ने संगणकीय अनुरूपणों (सिमुलेशन) का उपयोग किया एवं यह पाया कि केटीडीपी बायलेयर कोशिका झिल्लियों की तुलना में लिपिड बूँदों की अद्वितीय मोनोलेयर वाली सतहों के साथ उल्लेखनीय रूप से अधिक सुदृढ़ एवं स्थिर बंध बनाता है। बंधन का यह अंतर केटीडीपी को लिपिड बूँद की सतह से काइनेसिन-1 को भौतिक रूप से विस्थापित करने में सक्षम बनाता है एवं बूँद को कोशिका के छोर तक परिवहित होने से रोकता है, जहाँ वीएलडीएल कणों को संयोजित करके रक्त में स्रावित किया जाता है।
इसके पश्चात शोधदल ने मूषक यकृत की, प्रयोगशाला में संवर्धित कोशिकाओं में केटीडीपी के प्रभाव का परीक्षण किया, जो प्राकृतिक रूप से वीएलडीएल कणों का स्राव करती हैं। इस कारण ये कोशिकाएं वसा उपापचय के अध्ययन के लिए एक अत्यंत उपयोगी प्रतिरूप होती हैं। जैव रासायनिक परीक्षणों एवं फ्लूरोसन्स चित्रण प्रयोगों का उपयोग करते हुए शोधकर्ताओं ने पुष्टि की कि केटीडीपी पेप्टाइड सीधे लिपिड बूँदों की मोनोलेयर झिल्ली से जुड़ जाता है। डॉ. त्रिपाठी ने बताया,
“इस पेप्टाइड ने अन्य प्रमुख अंतःकोशिकीय परिवहन को व्यापक रूप से अप्रभावित रखते हुए, केवल लिपिड-बूँद परिवहन को ही बाधित किया।”
आईआईएसईआर पुणे में प्राध्यापक सिद्धेश कामत की प्रयोगशाला की सहायता से शोधकर्ताओं ने लिपिड बूँदों के परिवहन को अवरुद्ध करने के पश्चात मूषक कोशिकाओं द्वारा स्रावित की गई वसा की मात्रा का मापन किया। लिपिडोमिक्स एवं जैव रासायनिक परीक्षणों के माध्यम से शोधकर्ताओं ने पाया कि कोशिकाओं में केटीडीपी सम्मिलित किए जाने के पश्चात ट्राइग्लिसराइड एवं कोलेस्ट्रॉल के स्राव में लगभग 50% की कमी आई।
इस चरण पर शोधकर्ताओं के लिए एक मुख्य चिंता यह थी कि क्या यकृत से वसा के निकास को अवरुद्ध करने से यकृत के भीतर हानिकारक स्तर पर लिपिड का संचय हो सकता है, जो संभावित रूप से वसायुक्त यकृत रोग को बढ़ावा दे सकता है। परंतु आश्चर्यजनक रूप से, ऐसा नहीं हुआ। प्रा. मल्लिक के शोधदल के लाइव इमेजिंग ने यह प्रदर्शित किया कि वसीय अम्लों को लिपिड बूँदों से माइटोकॉन्ड्रिया (कोशिका के ऊर्जा-उत्पादक अंगक) की ओर पुनः निर्देशित किया जा रहा था, जहाँ ऊर्जा उत्पादन के लिए उनका विघटन किया गया।
संवर्धित मूषक कोशिकाओं में प्राप्त आशाजनक निष्कर्षों को देखते हुए, शोध दल यह परीक्षण करना चाहता था कि क्या केटीडीपी किसी जीवित पृष्ठवंशी में भी समान परिणाम दे सकता है। आईआईटी मुंबई में प्राध्यापिका श्रीलजा नायर के साथ सहयोग करते हुए, उनकी प्रयोगशाला में शोधदल ने जेब्राफिश का प्रतिरूप जीव के रूप में उपयोग किया क्योंकि जेब्राफिश की लिपोप्रोटीन प्रणालियां मानव-सदृश होती हैं। जेब्राफिश को प्रारंभ में उच्च वसायुक्त आहार दिया गया एवं तत्पश्चात फ्लूरोसन्स से लेपित अंडे के पीतक (एग योक) के लिपोसोम के माध्यम से केटीडीपी प्रदान किया गया (लिपोसोम शरीर के भीतर जैविक अणुओं को ले जाने में सक्षम सूक्ष्म वसा-सदृश बूँदें होती हैं)।
डॉ. महापात्रा कहते हैं,
“यकृत तक एक उपचारात्मक पेप्टाइड पहुँचाने के लिए विशेष रूप से अंडे के लिपोसोम का उपयोग करना एक ऐसी विधि है जिसे हमने इस अध्ययन में विकसित किया है।” चूँकि जेब्राफिश के डिंभक (लार्वा) लगभग पारदर्शी होते हैं, इसलिए शोधकर्ता इन जीवों को बिना कोई क्षति पहुँचाए सूक्ष्मदर्शी के माध्यम से इन लिपिडों का प्रत्यक्ष दृश्य अवलोकन कर सके।
सूक्ष्मदर्शी के अंतर्गत फ्लूरोसन्स चित्रण ने इस बात की पुष्टि की कि वह पेप्टाइड यकृत तक पहुँच गया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि डिंभक एवं वयस्क जेब्राफिश दोनों में ही केटीडीपी उपचार के पश्चात रक्त में ट्राइग्लिसराइड तथा कोलेस्ट्रॉल का स्तर लगभग 50% तक कम हो गया था, जो मूषक कोशिकाओं में प्राप्त प्रेक्षणों के सर्वथा अनुरूप था।
अपने कार्य के महत्व को रेखांकित करते हुए प्रा. नायर कहती हैं,
“जेब्राफिश के रक्त में लिपिड के स्तर को सफलतापूर्वक कम करने के लिए अंडों से निर्मित लिपोसोम में एक लघु पेप्टाइड को समाविष्ट करना एक सर्वथा नूतन उपलब्धि है। हमारी जानकारी के अनुसार, इससे पहले ऐसा कभी नहीं किया गया है।” शोधकर्ताओं ने इस अंडे के लिपोसोम-आधारित वितरण पद्धति से संबंधित एक पेटेंट भी पंजीकृत कराया है।
केटीडीपी उपचार के पश्चात जेब्राफिश की कई दिन निगरानी की गई। जेब्राफिश में कोई विकासात्मक असामान्यता, मृत्यु दर में वृद्धि या यकृत में हानिकारक लिपिड संचय नहीं देखा गया। इस से शोधकर्ताओं के दृष्टिकोण की प्रभावशीलता तथा सुरक्षा की पुष्टि हुई।
यह शोध अभी पूर्व-नैदानिक (प्रीक्लिनिकल) चरण में है। दीर्घकालिक सुरक्षा का आकलन करने, पेप्टाइड वितरण को इष्टतम बनाने एवं स्तनधारी प्राणियों में इसकी प्रभावकारिता का मूल्यांकन करने के लिए भविष्य में अधिक अध्ययनों की आवश्यकता है। तथापि, यह अध्ययन एक ऐसी आशाजनक दिशा की ओर संकेत करता है जिस पर उपापचयी रोगों के उपचार में अब तक बहुत कम ध्यान दिया गया है।
प्रा. मल्लिक कहते हैं, “वर्तमान चिकित्सा पद्धतियाँ कोलेस्ट्रॉल को कम करने में प्रभावी हैं, परंतु ट्राइग्लिसराइड को कम करने के विकल्प अब भी सीमित हैं। हमारा विश्वास है कि यह शोध अंततः उस चुनौती का सामना करने के लिए नई रणनीतियों के विकास में योगदान दे सकता है।”
प्रा. मल्लिक के लिए यह अध्ययन एक लंबी शोधयात्रा का चरमोत्कर्ष है। वह अंत में कहते हैं,
“अंतःकोशिकीय परिवहन के विषय में मौलिक एवं जिज्ञासा-प्रेरित प्रश्न के रूप में जो यात्रा प्रारंभ हुई थी, उसने धीरे-धीरे उपापचयी विकारों के लिए एक संभावित महत्वपूर्ण उपचारात्मक अवसर को प्रकट कर दिया।”
