तेजस्वी रंग के वस्त्रों के साथ प्रायः एक अदृश्य मूल्य जुड़ा होता है। वस्त्रों को समृद्ध आभा प्रदान करने वाले रंग अर्थात रंजक (डाई) अंततः वस्त्र निर्माण उद्योगों से प्रवाहित होकर नदियों तथा मृदा से होकर अपशिष्ट जल में मिल जाते हैं। इनमें से अनेक रंजकों का सहज विघटन नहीं होता। ये रंजक पर्यावरण में निरंतर बने रहते हैं, जल निकायों में सूर्यप्रकाश के प्रवेश को अवरुद्ध करते हैं एवं जीवों को क्षति पहुँचाते हैं।

रंजक द्वारा होने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए उद्योग पहले से ही कई विधियों का उपयोग करते हैं। सबसे प्रचलित विधियाँ सक्रियित (ॲक्टिव्हेटेड) कार्बन, जिओलाइट एवं पॉलिमरिक रेज़िन जैसे अधिशोषक (एडसोर्बेन्ट) पदार्थों पर निर्भर करती है, जो रंजक के अणुओं को अपने भीतर जकड़ लेती हैं। यद्यपि यह प्रक्रिया जल से रंजक को हटाने में प्रभावी होती है, किंतु यह समस्या का पूर्ण समाधान नहीं करती है। जकड़ा हुआ रंजक अक्षत बना रहता है और इसे प्रायः अन्यत्र विसर्जित कर दिया जाता है, जहाँ से यह मृदा अथवा भराव क्षेत्रों में रिस सकता है।

एक अन्य मार्ग है जैविक उपचार। कुछ विशिष्ट जीवाणु रंजक के अणुओं को विघटित कर सकते हैं, जो इसे एक अधिक पूर्ण समाधान बनाता है। किंतु ये प्रणालियाँ अत्यंत धीमी होती हैं एवं उच्च क्षारीय स्तर वाले अपशिष्ट जल जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रायः प्रभावी नहीं होती हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मुंबई के एक शोधदल ने राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान गोवा के सहयोगियों के साथ इस समस्या का समाधान खोजने का प्रयास किया है। आईआईटी मुंबई की प्राध्यापिका शोभा शुक्ला ने इस दल का नेतृत्व किया। इन शोधकर्ताओं ने एक ऐसा अभिनव पदार्थ निर्मित किया है जो रंजक के शोषण की क्षमता के साथ ही एक जीवाणु घटक को एकीकृत करके अवशोषित रंजक अणुओं का विघटन भी करता है। यह सहक्रियात्मक दृष्टिकोण रंजक से होने वाले प्रदूषण के अधिक स्थायी और व्यापक समाधान की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है। उनका यह अध्ययन हाल ही में जर्नल ऑफ मटेरियल्स केमिस्ट्री ए में प्रकाशित हुआ।

शोधकर्ताओं ने ग्राफीन ऑक्साइड नैनोशीट और बैसिलस एनएजी1 नामक एक समुद्री जीवाणु वंश का उपयोग करके एक सूक्ष्म जैव-नैनो प्रणाली निर्मित की है। इस जीवाणु को मैंग्रोव के परिवेश से विलगित किया गया था, जहाँ सूक्ष्मजीव प्राकृतिक रूप से परिवर्तनशील परिस्थितियों और प्रदूषकों के संपर्क में रहते हैं।

“ये जीवाणु प्रयोगशाला में उपयोग किये जाने वाले मानक जीवाणु वंशों की तुलना में अधिक सुदृढ़ प्रकृति के होते हैं एवं क्षारीय परिस्थितियों में जीवित रह सकते हैं। समुद्री जीवाणु उच्च क्षारीय स्तर, उच्च पीएच मान तथा तापमान जैसे चरम वातावरण को सहन करने में सक्षम होते हैं,” प्रा. शुक्ला कहती हैं।

रंजक अणुओं को पकड़ने के लिए शोधकर्ताओं ने ग्राफीन ऑक्साइड का उपयोग किया। ग्राफीन ऑक्साइड उच्च पृष्ठ क्षेत्र वाला पतला नैनोशीट पदार्थ है जो जल में भली-भाँति प्रकीर्णित हो जाती है एवं प्रदूषकों के साथ कुशलतापूर्वक जुड़ जाता है। यह पदार्थ जीवाणुओं को संलग्न होने के लिए एक पृष्ठ भी प्रदान करता है जिससे यह पदार्थ-आधारित एवं जैविक उपचारों के संयोजन हेतु उपयुक्त समाधान बनता है। यद्यपि ग्राफीन ऑक्साइड में जीवाणुरोधी प्रभाव हो सकते हैं, किंतु यह इसकी सांद्रता (कंसंट्रेशन) पर निर्भर करता है। सांद्रता के नियंत्रित स्तरों पर यह रंजकों को जकड़ते हुए जैविक गतिविधियों का समर्थन कर सकता है। इस गुणधर्म के कारण यह पदार्थ केवल प्रदूषकों का अधिशोषण (एडसोर्प्शन) करने वाले पदार्थों की तुलना में अधिक प्रभावी बनता है।

ग्राफीन ऑक्साइड की सांद्रता का उचित संतुलन खोजने हेतु शोधदल ने इस बात का परीक्षण किया कि जीवित समुद्री जीवाणुओं ने ग्राफीन ऑक्साइड की विभिन्न सांद्रता के प्रति कैसी प्रतिक्रिया दी, एवं प्रमाणित प्रयोगशाला विधियों एवं सूक्ष्मदर्शिकी का उपयोग करके उनकी वृद्धि तथा संलग्नता का अवलोकन किया। उन्होंने पाया कि निम्न से मध्यम सांद्रता पर जीवाणु सक्रिय एवं नैनोशीट से चिपके रहे, जबकि ग्राफीन ऑक्साइड की उच्च सांद्रता ने उनकी सक्रियता को कम कर दिया। शोधकर्ताओं ने ग्राफीन ऑक्साइड की सांद्रता की एक इष्टतम सीमा की पहचान की जिससे जीवाणु-वृद्धि एवं रंजक विघटन दोनों का समर्थन होता है।

अध्ययन की प्रथम लेखिका डॉ. नेहा रेडकर स्पष्ट करती हैं, “ग्राफीन ऑक्साइड नैनोशीट पर समुद्री जीवाणुओं को संलग्न करके हमने एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जहाँ पदार्थ रंजक को अधिशोषित करता है एवं उसे जीवाणु द्वारा विघटन के लिए अधिक सुलभ बनाता है।”

शोधकर्ताओं की यह व्यवस्था एक व्यावहारिक समस्या के समाधान में भी सहायता करती है। प्रदूषित जल में स्वतंत्र रूप से तैरने वाले जीवाणु जल प्रवाह के साथ बह जाते हैं। उन्हें ग्राफीन ऑक्साइड जैसे पृष्ठ पर संलग्न करने से वे अपने स्थान पर स्थिर तथा सक्रिय रहते हैं।

शोधकर्ताओं ने दो सामान्यतः उपयोग किए जाने वाले रंजकों, एज़्योर ए एवं एज़्योर बी पर अपनी प्रणाली का परीक्षण किया। ये रंजक अपनी स्थिर संरचना और विघटन के प्रति प्रतिरोध के लिए जाने जाते हैं। नवीन जैव-नैनो प्रणाली का उपयोग करने पर लगभग 24 घंटों के भीतर अधिकांश रंजक लुप्त हो गए एवं उनकी निष्कासन दक्षता 95 प्रतिशत के निकट रही।

यद्यपि ग्राफीन ऑक्साइड एवं जीवाणु वाली प्रणालियों पर पहले भी प्रयोग किए गए हैं, किंतु यह अध्ययन एक सरल और एकीकृत संरचना में बैसिलस एनएजी1 जैसे समुद्री जीवाणु वंश को ग्राफीन ऑक्साइड नैनोशीट के साथ संयोजित करने वाले प्रथम प्रयासों में से एक है। पूर्व के पद्धतियों में प्रायः एक से अधिक चरण की प्रक्रियाएं या हाइड्रोजेल एवं मणियों जैसे संरचित पदार्थ सम्मिलित होते हैं, जिन्हें निर्माण करना अधिक कठिन एवं लागत प्रधान हो सकता है, तथा वे जीवाणुओं तक प्रदूषकों की पहुँच को भी सीमित कर सकती हैं। ये पद्धतियाँ कार्य करने में प्रायः अधिक समय लेती हैं, या ग्राफीन ऑक्साइड का ऐसे रूपों में अपचयन होने का कारण बन सकती हैं जो कोशिकाओं के लिए विषाक्त हो सकते हैं। 

इस अध्ययन में विकसित जैव-नैनो प्रणाली शीघ्र एवं प्रभावी प्रकार से रंजक को पानी से हटा सकती है। प्रणाली का प्रत्येक घटक अपनी भूमिका निभाता है : ग्राफीन ऑक्साइड रंजक के अणुओं को अपने पृष्ठ की ओर आकर्षित करता है, तथा जीवाणु उन्हें विघटित कर देते हैं।

Schematic representation of the assembly of a bio-nano system using graphene oxide (GO) nanosheets and marine bacteria (NAG1) for the mineralisation (breakdown) of textile dyes. Credits: Authors of the study

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि ग्राफीन ऑक्साइड की उपस्थिति में जीवाणुओं ने अधिक एंजाइम का उत्पादन किया। ये एंजाइम, उदाहरणस्वरूप लाकेस एवं पेरोक्सीडेसेस, रंजकों में पाई जाने वाली जटिल रासायनिक संरचनाओं को तोड़ने के लिए जाने जाते हैं। रासायनिक विश्लेषण से पता चला कि रंजक छोटे यौगिकों में परिवर्तित हो गए थे जो आगे भी विघटित हो सकते थे।

सूक्ष्मदर्शी से प्राप्त छवियों ने दर्शाया कि यह प्रक्रिया सूक्ष्म स्तर पर कैसे कार्य करती है। ग्राफीन ऑक्साइड की परतों ने स्तरीय संरचनाएं बनाईं, जिनमें जीवाणु पृष्ठ पर एवं परतों के भीतर संलग्न थे। इस व्यवस्था ने रंजक अणुओं को जीवाणुओं के समीप लाया, जिससे विघटन की प्रक्रिया में सहायता मिली।

Scanning electron microscopy image (pseudo-colored using software for better representation) showing graphene oxide sheets acting as a scaffold for bacterial attachment. Credits: Authors of the study.

“हम केवल रंजक को हटा नहीं रहे हैं या केवल उसे शोष नहीं रहे हैं। हम रंजक को उसके सरलतम तथा अहानिकारक रूपों में विघटित कर रहे हैं,” प्रा. शुक्ला कहती हैं।

शोधकर्ताओं का विश्वास है कि उनकी संकल्पना में वास्तविक अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों में कार्य करने की क्षमता है, यद्यपि कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ अभी भी शेष हैं।

“मेरा मानना है कि हमारा दृष्टिकोण बड़े स्तर पर लागू करने योग्य है, किंतु वर्तमान उपचार तकनीकों की तुलना में इस प्रणाली का परिरक्षण थोड़ा महंगा हो सकता है,” डॉ. रेडकर स्पष्ट करती हैं।

तथापि यह पद्धति वह समाधान प्रदान करती है जिसका वर्तमान विधियों में प्रायः अभाव होता है। प्रदूषकों को जकड़ने के बाद उन्हें अन्यत्र स्थानांतरित करने के स्थान पर, इस पद्धति का उद्देश्य उन्हें पूर्णतः विघटित करना है।

शोधकार्य का अगला चरण एक अधिक व्यावहारिक प्रणाली को अभिकल्पित करना है। समतल नैनोशीट के स्थान पर, शोधकर्ता स्पंज जैसे पदार्थों की खोज कर रहे हैं जो अधिक जीवाणुओं को धारण कर सकें एवं अपशिष्ट जल की विशाल मात्रा का उपचार कर सकें।

“हम एक प्रकार का एकीकृत समाधान चाहते हैं जो एक संक्षिप्त प्रणाली में प्रदूषकों को जकड़ सके, थाम सके एवं उन्हें विघटित कर सके,” प्रा. शुक्ला कहती हैं।

यदि यह सफल होता है, तो ऐसी प्रणालियाँ उद्योगों को प्रदूषण को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किए बिना, अपशिष्ट जल का अधिक प्रभावी ढंग से उपचार करने में सहायता कर सकती हैं।