आपके क्षतिग्रस्त दांत के लिए लगाए जाने वाले डेंटल इम्प्लांट का उच्च तापमान वाली भट्टियों से भला क्या लेना-देना होगा? पूरी संभावना है कि वह इम्प्लांट 3डी प्रिंटिंग अर्थात त्रि-विमीय मुद्रण के माध्यम से बनाया गया हो, जिसे तकनीकी रूप से ‘एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग’ यानी संकलनात्मक विनिर्माण कहा जाता है और जिसके अंतिम चरण में ‘सिंटरिंग’ की आवश्यकता होती है। सिंटरिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी वस्तु को भट्टी के भीतर बहुत उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है। प्राकृतिक दांतों की मजबूती और स्वरूप की प्रतिकृति पाने के लिए आवश्यक सुदृढ़ पदार्थों को पारंपरिक विधियों का उपयोग करके आकार देना अत्यंत कठिन होता है। यहाँ तक कि सामान्य एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग विधियाँ जिनमें पदार्थ के निक्षेपण के समय ही लेज़र पदार्थ को पिघलाकर जोड़ता है, उनका इन पदार्थों के लिए उपयोग चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए इम्प्लांट के पदार्थ के सूक्ष्म कणों को एक बंधनकारी कारक (बाइंडिंग एजेंट) के साथ मिलाकर एक के ऊपर एक परत से इम्प्लांट की संरचना का निर्माण होता है। तत्पश्चात उसे भट्टी में तपाया जाता है ताकि बंधनकारी तत्व जलकर निकल जाए और पदार्थ के कण आपस में जुड़कर एक ठोस संरचना का रूप प्राप्त करें।
लेजर के माध्यम से पिघलाकर बनाई जाने वाली एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग विधि जिरकोनिया जैसे उच्च गलनांक वाले सिरेमिक पदार्थ एवं तांबे जैसे अत्यधिक परावर्तक पदार्थों के लिए व्यवहार्य नहीं है। इन सामग्रियों को पहले मुद्रित किया जाता है और उसके पश्चात भट्टी में तपाया जाता है। सिंटरिंग प्रक्रिया में घटक 10 से 15% तक सिकुड़ जाते हैं। इस संकुचन एवं गुरुत्वाकर्षण के कारण भारी भागों के नीचे की ओर झुकने की प्रवृत्ति के एकत्रित प्रभाव के कारण अंतिम प्राप्त उत्पाद प्रायः अपने मूल डिजिटल डिजाइन के आकार और स्वरूप से मेल नहीं खाते। यद्यपि प्रारंभिक डिजाइन के आकार को केवल बढ़ा देना एक तार्किक समाधान प्रतीत होता है परंतु पदार्थ बहुधा असमान रूप से संकुचित होता है। इन विकृतियों को ठीक करने और सटीक माप प्राप्त करने के लिए निर्माताओं को वांछित परिणाम पाने तक पुनः पुनः परीक्षण करना पड़ता है, जिसके लिए लागत एवं समय की आवश्यकता होती है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई के यांत्रिकी अभियांत्रिकी विभाग के प्राध्यापक गुरमिंदर सिंह एवं उनके शोधदल ने ओवन-सिंटरिंग, यानि भट्टी में तापन, आधारित एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग द्वारा निर्मित घटकों में सिंटरिंग के कारण होने वाले संकुचन और विरूपण का पूर्वानुमान लगाने के लिए परिष्कृत मॉडल विकसित किए हैं। सिरेमिक और तांबे पर केंद्रित दो अध्ययनों में प्रकाशित उनके निष्कर्ष यह प्रदर्शित करते हैं कि डिजाइन के चरण में ही सिंटरिंग के समय उस वस्तु का आकार कैसे बदलेगा इसकी सटीक गणना करना संभव है। यह जानकारी डिजाइन के स्तर पर ही थ्रीडी-मुद्रित वस्तुओं के लिए उपयुक्त आयाम निर्धारित करने में सहायता कर सकती है।
सिरेमिक पर किए गए अध्ययन में शोधकर्ता प्रणीत कुमार रेड्डी पुचकायला, प्रा. प्रसन्न गांधी और प्रा. गुरमिंदर सिंह ने 3-मोल% इट्रिया-स्टैबिलाइज्ड जिरकोनिया (3-YSZ) का उपयोग किया। भौतिकी-आधारित मॉडलिंग दृष्टिकोण का प्रयोग करते हुए उन्होंने एक ‘कॉन्स्टिट्यूटिव’ मॉडल (गणितीय समीकरणों का एक समूह) विकसित किया। यह मॉडल पदार्थ का तापन करते समय पदार्थ का एक चिपचिपे (श्यान) तरल के समान व्यवहार का वर्णन करता है। उन्होंने पाया कि तापमान के साथ पदार्थ के घनत्व और श्यानता (विस्कॉसिटी) में होने वाले परिवर्तनों को मापकर वे बेलनाकार और पाइन-ट्री आकर जैसी जटिल संरचनाओं के अंतिम आयामों का उच्च सटीकता के साथ पूर्वानुमान लगा सकते हैं।
“श्यानता मुद्रण के समय पदार्थ के व्यवहार को नियंत्रित करती है एवं यह दर्शाती है कि पदार्थ कितनी सहजता से प्रवाहित होता है, उसकी परतें कितनी अच्छी तरह एक के ऊपर एक जमती हैं और मुद्रित भाग में कितना आंतरिक प्रतिबल (इंटरनल स्ट्रेस) संचित होता है। दूसरी ओर सापेक्ष घनत्व जो मुद्रित भाग के घनत्व और पदार्थ के सैद्धांतिक घनत्व का अनुपात है, सिंटरिंग से पहले के व्यवहार को नियंत्रित करता है तथा यह बताता है कि उसमें कितना ठोस पदार्थ उपस्थित है और रिक्तता कितनी है। सिंटरिंग से पहले कम घनत्व होने का अर्थ है अधिक संकुचन और विरूपण,” प्रा. गुरमिंदर सिंह समझाते हैं।
श्यानता को मापने से हमें यह पता चलता है कि मुद्रण के समय वह भाग क्यों और कैसे विरूपित हो सकता है, जबकि सापेक्ष घनत्व को मापने से हमें यह ज्ञात होता है कि उसमें कितना विरूपण होगा।
सिंटरिंग किए जाने पर थ्रीडी-मुद्रित वस्तु अधिक सघन हो जाती है। घनीकरण का विश्लेषण करने हेतु उन्होंने धीरे-धीरे ताप बढ़ाया और विशिष्ट तापमान अंतरालों में यह देखा कि घनत्व और संकुचन किस प्रकार घनीकरण की गति को प्रभावित करते हैं। एक अन्य प्रयोग में शोधकर्ताओं ने प्रत्येक तापमान चरण पर एक निश्चित भार लगाया और घनीकरण के संगत स्तर पर श्यानता का अनुमान लगाया। एक ही तापमान पर घनीकरण के विभिन्न चरणों में श्यानता का अनुमान लगाने के लिए शोधकर्ताओं ने उस तापमान चरण को लंबी अवधि तक बनाए रखा। उन्होंने प्रत्येक तापमान चरण पर क्रमिक रूप से भार बढ़ाया।
प्रा. गुरमिंदर सिंह का कहना है, “भार का उपयोग वास्तविक उपयोग में होने वाले यांत्रिक भार की स्थितियों का अनुकरण करने के लिए किया जाता है। बिना किसी भार के केवल तापीय संकुचन का प्रदर्शन होता। भार के उपयोग के साथ ताप-यांत्रिक विरूपण को समझा जा सकता है जो वास्तविक औद्योगिक भागों के व्यवहार के कहीं अधिक निकट है। भार-आधारित अध्ययन से हम सिंटरिंग के समय पर संरचनात्मक स्थिरता का परीक्षण कर सकते हैं।”
शोधकर्ताओं ने इस डेटा को एक कंप्यूटर आधारित अनुरूपण (सिमुलेशन) में शामिल किया। उन्होंने तीन उत्तरोत्तर जटिल आकृतियों के माध्यम से सिमुलेशन की पुष्टि की जिसमें एक बेलनाकार, एक अंग्रेजी आई अक्षर का आकार (I -सेक्शन) और कई लटकती हुई शाखाओं वाली एक ‘पाइन-ट्री’ जैसी संरचना शामिल थी।
शोधकर्ताओं ने सूचित किया कि इस मॉडल के माध्यम से अंतिम आयामों का पूर्वानुमान केवल 0.8 से 2.03% तक की त्रुटि के साथ लगाया गया, अतः मॉडल अत्यधिक प्रभावी था। एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि सिरेमिक घोल में सिरेमिक कणों के आकार के विशिष्ट मिश्रण से निर्मित भाग ‘क्रीपिंग’ यानी अपने स्वयं के भार के कारण धीरे-धीरे झुकने के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी बन गए, जिससे सिंटरिंग के समय लंबी लटकती हुई शाखाएं भी सीधी बनी रहीं। इस सिमुलेशन ने आंतरिक प्रतिबलों का भी सटीक मानचित्रण किया जिससे यह पुष्टि हुई कि इस प्रक्रिया में यह भाग टूटेंगे नहीं या विफल नहीं होंगे।
तांबे पर केंद्रित दूसरे अध्ययन में श्री भरणी घंटसाला और प्रा. गुरमिंदर सिंह ने एक हाइब्रिड मॉडल विकसित किया जिसमें पारंपरिक भौतिकी-आधारित सिमुलेशन एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग को एकीकृत किया गया। शोधकर्ताओं ने सात इनपुट मापदंडों को बदलकर सिंटरिंग के आठ प्रयोग किए जिनमें सिंटरिंग तापमान, वह समय जब तापमान स्थिर रखा जाता है, वांछित तापमान प्राप्त होने हेतु तापमान वृद्धि की दर, शीतलन की दर, कुल प्रक्रिया समय और मुद्रित नमूने का प्रारंभिक सापेक्ष घनत्व शामिल थे। वास्तविक प्रयोगात्मक डेटा और कंप्यूटर-जनित परिणामों सहित एक विशाल डेटासेट पर ‘आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क’ को प्रशिक्षित करके उन्होंने प्रणाली को यह सिखाया कि ताप चक्र के समय पदार्थ का घनत्व कैसे बदलता है।
शोधकर्ताओं ने एसएचएपी यानी शेपली एडिटिव एक्सप्लेनेशन्स (SHapley Additive exPlanations) पद्धति का उपयोग किया। यह पद्धति मशीन लर्निंग मॉडल के अंतिम अनुमान में प्रत्येक इनपुट मापदंड के योगदान को मापती है। इससे यह पता चलता है कि कौन से प्रक्रिया-मापदंड विरूपण पर प्रमुख प्रभाव रखते हैं और क्या प्रत्येक मापदंड विरूपण को बढ़ाता है या घटाता है। उन्होंने पाया कि पूरी प्रक्रिया का समय और तापन की दर सबसे प्रभावशाली कारक हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि कोई मुद्रित भाग अंततः कैसे अपना अंतिम स्थिर रूप लेता है। गुरुत्वाकर्षण के कारण मुद्रित भाग के प्रलंबित हिस्से किस प्रकार नीचे की ओर झुकते हैं इसका परीक्षण करने हेतु उन्होंने इस कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित मॉडल का परीक्षण अंग्रेजी आई अक्षर (I) जैसी जटिल आकृतियों पर किया।
हाइब्रिड मॉडल ने प्रयोगात्मक परिणामों से 98% सफलता से मेल खाया। प्रलंबित हिस्सों के नीचे की ओर झुकने के कारण बनने वाली अंतिम आकृति का पूर्वानुमान लगाने में इस मॉडलने पारंपरिक कंप्यूटर मॉडलों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अच्छा प्रदर्शन किया।
सारांशतः ये अध्ययन दर्शाते हैं कि एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग और उसके पश्चात होने वाली सिंटरिंग की प्रक्रिया में संकुचन और विरूपण यादृच्छिक नहीं होता है और इसका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। प्रा. गुरमिंदर सिंह निष्कर्ष निकालते हुए कहते हैं,
“यह शोध इस क्षेत्र को ट्रायल-एंड-एरर वाली सिंटरिंग से दूर कर पूर्वानुमानित और मॉडल-आधारित विनिर्माण की ओर ले जाता है, जो उन्नत एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग के विज्ञान में एक बड़ा वैचारिक परिवर्तन दर्शाता है। इस प्रकार का तकनिकी ढांचा अंततः स्मार्ट CAD टूल्स के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, जहाँ अनुमानित संकुचन को स्वचालित रूप से डिजाइन पर लागू किया जाएगा और आगे होने वाले संकुचन को ध्यान में रखते हुए पहलेसे समायोजित कर ज्यामितीय आकृतियाँ सीधे तैयार की जा सकेंगी।”
